कितना भी लिखा जाय , नर्मदा के महात्म्य का पूरा वर्णन नहीं किया जा सकता है |
नर्मदा मंदिर – उद्गम
भारत में गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा , सिन्धु ,कावेरी ब्रम्हपुत्रा , कृष्णा नदियों का विशेष महत्त्व माना गया है |
नर्मदाजी का उद्गम अमरकंटक में है | सतपुड़ा और विन्ध्य पर्वत की फैली हुई श्रृंखला को मैकल पर्वत भी कहा जाता है | नर्मदाजी को मेकलसुता और रेवा के नाम से भी जाना जाता है |
नर्मदा को वैराग्य की अधिष्ठात्री माना गया है | नर्मदा के किनारेअनेकों दिव्य तीर्थ , ज्योतिर्लिंग ,उपलिंग, मंदिर स्थापित हैं | नर्मदा भारत ही नहीं , विश्व की एकमात्र नदी ,जिसकी परिक्रमा की जाती है | इसकी एक विशेषता यह भी है कि दक्षिण भारत के पठार की अन्य नदियों विपरीत पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है
नर्मदा जी भगवान शंकर की पुत्री है ,जो उनके नीलकंठ से निसृत हुई है | भगवान शंकर ने वरदान दिया कि तुम चिरकुंवारी रहोगी, जो फल तीर्थों में स्नान करने से होता है , वह तुम्हारे दर्शन मात्र से होगा ,गंगा के सामान महात्म्य होगा, मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगा | वर्ष में एक बार गंगाजी भी नर्मदा में स्नान करने आती हैं |
परिक्रमा में अमरकंटक और ओम्कारेश्वर ये दो महत्वपूर्ण स्थान माने गए हैं | चिरकाल से , साधू , सन्यासी , ऋषि , संत , महात्मा नर्मदाजी के किनारे तपस्या करते रहे हैं | चिरकाल से ही नर्मदाजी की परिक्रमा होती रही है | अब लोग साधनों से भी यात्रा करने लगे हैं |
परिक्रमा वासियों को कभी भी कोई कष्ट नहीं होता , भोजन आदि का प्रबंध सहज ही हो
जाता है – माँ की ऐसी कृपा है |
जहाँ भी नर्मदाजी है , वहां से परिक्रमा प्रारंभ कर वहीँ पूर्ण की जाती है | अधिकतर लोग अमरकंटक या ओम्कारेश्वर से प्रारंभ करते हैं | वैसे तो परिक्रमा के बहुत नियम हैं | मुख्य रूप से – परिक्रमा के दौरान नर्मदाजी को लांघना नहीं है , नर्मदाजी हमेशा दाहिनी ओर रहना चाहिए, जहाँ नर्मदाजी नहीं हों वहां नर्मदा जल का दर्शन पूजन करना चाहिए, अनर्गल बातें न करे , नर्मदे हर नर्मदे हर का उच्चारण या मानसिक जप , गुरु मन्त्र का जप करना चाहिए , सादा भोजन करें, |
परिक्रमा के समय जो अनुभव होते हैं , उन पर विचार करें ,आत्मसात करें , जीवन में परिवर्तन की सम्भावना बनती है |
परिक्रमा यात्रा पूर्ण करने के बाद रेवा संगम ( रेवा सागर / अरब सागर) से लाये हुवे जल को ओम्कारेश्वर में ज्योतिर्लिंग पर अर्पण किया जाता है , तभी परिक्रमा परिपूर्ण होती है |
अक्टोबर से अप्रेल मई तक यात्रा की जाती है | शिवरात्रि के बाद मौसम अधिक अनुकूल रहता है |
नर्मदे हर
त्वदीय पाद पंकजम् , नमामि देवी नर्मदे
विशेष : यात्रा के पहले दिन का वर्णन 13 जून 2019 , इसी स्थान पर देखिये .
महान तपस्वी वीतराग प्रातः स्मरणीय सहज सरल संत सद्गुरु पूज्य बाबा कल्याणदास जी ,
नर्मदा नदी का उद्गम अमरकंटक है , यह तो स्कूल में पढ़ा था | देखने का सौभाग्य 1989 में प्राप्त हुवा |
नर्मदा मंदिर – उद्गम
अमरकंटक का प्रभाव तथा प्रारब्ध के फल स्वरूप उसी समय श्री कल्याण सेवा आश्रम से जुड़ गए |
श्री कल्याण सेवा आश्रम
फिर परम पिता परमेश्वर की असीम कृपा से महान तपस्वी ,वीतराग ,प्रातःस्मरणीय, सहज सरल संत सद्गुरु परम पूज्य बाबाजी (कल्याण दास जी) की प्राप्ति हुई | तब से बाबाजी की कृपा निरंतर बरस रही है – परिणाम स्वरूप जीवन की दशा दिशा सोच में सकारात्मक परिवर्तन हो रहा है |
“ पूज्य बाबाजी व्यक्ति विशेष की प्रवृती को समझ लेते हैं | फिरव्यक्ति के कर्म फलानुसार ऐसी परिस्थितियां बनने लगती हैं कि वह उसी दिशा में आगे बढ़ता चला जाता है | प्रवृति की निरन्तरता और प्रबलता के आंकलन हेतु कभी कभी कुछ परीक्षाएं भी हो जाती हैं “ ऐसा मेरा व्यक्तिगत मानना है |
मुझे यह स्वीकार करने में ज़रा भी हिचक नहीं है कि सारे तीर्थों , मंदिरों , संतों , कथाओं प्रवचनों में बहुत ज्यादा और गहरी आस्था केमामले में मैं दूसरों से बहुत कमजोर ही हूँ | यद्यपि भारत के प्रचलिततीर्थों के अतिरिक्त अमरनाथ, तुंगनाथ, मुक्तिनाथ और पूज्य बाबाजी के साथ मन महेश , कैलाश मानसरोवर की यात्रायें भी की हैं | इन यात्राओं में श्रद्धा, आस्था से कहीं ज्यादा प्रबल पक्ष, उत्सुकता, साहसिक प्रयास और पूज्य बाबाजी की सानिध्यता का रहा है |
पूज्य बाबाजी द्वारा प्रसाद आशीर्वाद
नर्मदा परिक्रमा का विचार भी इसी स्वभाव के कारण बना था | कोई इच्छा या किसी मनोकामना की पूर्ति के लिए परिक्रमा करना है –ऐसा सोच था ही नहीं | आग्रह करने पर पूज्य बाबाजी ने स्वीकृति दी और हम निकल पड़े |
17 फरवरी 2018 को अमरकंटक से मैं ,पत्नी पुष्पा और ड्राईवरलोकनाथ इन्नोवा कार से प्रस्थान कर 5 मार्च को 17 वें दिनअमरकंटक में ही वापिस आये | नियम के अनुसार रेवा सागर (संगम- अरब सागर ) से लाये हुए जल से ओम्कारेश्वर में ज्योतिर्लिंग क अभिषेक किया जाता है | इस हेतु 10 मार्च को ओम्कारेश्वर में अभिषेक किया | पूज्य बाबाजी के आदेशानुसार , उज्जैन महाकाल के दर्शन भी 11 मार्च को किये | इस प्रकार हमने आराम से बिना जल्दबाजी के 20 दिनों में यह परिक्रमा पूर्ण की |
प्रश्न है की इस परिक्रमा का प्रत्यक्ष या परोक्ष लाभ क्या हुवा ?
सन 2004 से 2018 तक मैं सपत्नीक 25 से अधिक विदेशों की यात्रायें कर चुका हूँ | अलास्का ,ग्रीनलैंड और आइसलैंड जहाँ बहुत कमभारतीय जाते हैं, हम वहां भी जा चुके हैं | प्रकृति की मौलिकता को निकट से निहारने का अवसर मिला | केनेडा का कुछ भाग , रशिया , न्यूज़ीलैंड और जापान की यात्रायें शेष हैं , वहां जाने की इच्छा भी थी ,किन्तु नर्मदा परिक्रमा के बाद लगता है कि नर्मदा की परिक्रमा ही करते रहें |
जो आनंद , स्नेह , प्रेम, विविधता , भारतीय संस्कृति की थोड़ी सी झलक ,सैंकड़ों वर्षों पूर्व की आध्यात्मिक धरोहर , जीवन के प्रति नई समझ, नया सोच, निर्भयता , और अनुभव नर्मदा परिक्रमा में मिले ,वे अन्यत्र कहाँ मिलेंगे |
माँ का खजाना खुला है , जिसको जो समझ में आये – ले जाये |
लगभग 2700 किमी की ये पैदल परिक्रमा लोग अपनी अपनी क्षमता केअनुरूप छह माह से लेकर नियमानुसार तीन वर्ष तीन माह तेरह दिनों में पूरी करतेहैं | हमें पूरी यात्रा के दौरान पद यात्री मिलते ही थे | कोई ये समझन की भूल न करे कि पैदल परिक्रमा करने वाले ,महिला , पुरुष और संत अभावग्रस्त हैं या परिवार समाज से तिरस्कृत हैं | हमने इनसे बातें भी की | इनमे कई सम्पन्न परिवारों के भी थे , कुछ ऐसे भी थे जो दूसरी बार परिक्रमा कर रहे हैं | 70 वर्ष से भी ज्यादा की उम्र में भी 10 -12 किलो सामान साथ ले कर और औसत 20 किमी रोज़ की पदयात्रा कर रहे हैं, गिट्टी और कीचड़ पर चल कर ,गिरते पड़ते असुरक्षित बोट में बैठना , फिर घुटने तक कीचड़ पानी में उतरकर “ नर्मदे हर नर्मदे हर “ का उद्घोष – इन सबको – भारतीयों की अंधी श्रद्धा, प्राप्ति की आशा और पाप पुण्य का भय है – कह कर पल्ला झाड़ने से स्वयं के साथ और उनके साथ अन्याय होगा |
हमने प्रश्न किया – वाहन से क्यों नहीं ? तो कहा कि “ पैदल का आनंद ही अलग है | अनिर्धारित स्थान पर रुकना , समय पर भोजन न मिले या न बन सके तो बिस्किट गुड़ चना, पास में जो भी हो – प्रसाद समझ करखा लेना और नर्मदाजी का जल – इस प्रकार के जीवन का आनंद – सब सुविधाओं के बीच कहाँ मिलता है बाबूजी |” – “कोई थकान कोई परेशानी ? ना ,कोई खास नहीं |”
गुजरात , महाराष्ट्र व मध्य प्रदेश के परिक्रमा वासी
इन पद यात्रियों में इतनी उर्जा , मनोबल , उत्साह कहाँ से आता है ? उस विधा को पार किये बिना केवल तर्क से सही उत्तर नही मिलेगा |
साधारण से दिखने वाले किसी परिक्रमावासी को कुछ देना चाहा तो स्पष्ट मना कर दिया – हमारी आवश्यकता का सब कुछ हमारे पास है |परिक्रमावसियों के लिए मंदिरों में , आश्रमों में ,सदाव्रत ,निशुल्क या न्यूनतम राशी में सुविधाजनक आवास और शुद्ध स्वादिष्ट भोजन ,और तो और कुछ गृहस्थियों द्वारा प्रेम स्नेह आदर के साथ आग्रह कि आइये – भोजन प्रसाद पाइए, विश्राम कीजिये, फिर आगे जाइये – अभी तक की 74 वर्ष की उम्र तक , कुछ विशेष अवसरों और विशेष स्थानों पर किये गए भंडारों के सिवा ऐसा मैंने कहीं और नहीं देखा | इन सबके बदले वे आपसे कोई आशा या अपेक्षा भी नहीं रखते |
नर्मदाजी के घाट पर बच्चों के समूह में किसी को कपड़े दिये , किसीको बिस्किट या कुछ और या समूह में किसी को कुछ नही भी मिला तो भी सब बच्चे सामान रूप से प्रसन्न खुश | कोई शिकायत नहीं |
क्या आप इतने खुश हैं ?
ये सब रोज़ रोज़ देख कर यह समझ में आने लगा कि आवश्यकताओं की पूर्ति के बावज़ूद , इच्छाओं की पूर्ति के लिए लगातार संग्रह की प्रवृत्ति और निरर्थक श्रम से हमको न तो संतोष मिला और न ही प्रसन्नता | हमारी सम्पन्नता बेमानी है | साधारण समझे जाने वाले लोगों के श्रद्धा ,प्रेम और स्नेहसिक्त -जलपान , भोजन विश्राम के आग्रह को टालना हमारे समर्थ होने के अहंकार के अतिरिक्त क्या था ? साधारण समझे जाने वाले लोगों और इन बच्चों के सामने बहुत छोटे , बहुत बौने साबित हो गए हम | अहंकार और निरर्थकता का बोध ग्लानि के सिवाय क्या दे सकता है ?
साधारण से दिखने वाले छोटे ढाबे या छोटी होटल जहाँ बैठने के भी सही सुविधा न हो और जहाँ अक्सर हम जाना या कुछ खाना पसंद नही करेंगे , इस परिक्रमा के दौरान वहां भी आशा से अधिक शुद्ध और स्वादिष्ट भोजन प्राप्त हुवा |
स्वयं के बनाये हुवे अपने स्तर को दूसरों के स्तर से बहुत ज्यादा आंकने की भूल कर बैठते हैं |
मुख्य मार्ग से 15 किमी अंदर जाकर भी नर्मदाजी का दर्शन, पचासों सीढ़ियाँ उतर कर नमन, आचमन दुबारा स्नान – इसमें श्रद्धा या कुछ प्राप्ति, या मनोकामना पूर्ण होने की आशा का भाव कतई नहीं था | नर्मदा के प्रवाह, जल राशी , वातावरण और उसके किनारों में, घाटों मेंजो विविधता और विविधता में जो सोन्दर्य है, उसने बहुत ज्यादा आकर्षित किया | नर्मदा में सम्मोहन है और स्नेह है – अपने आप उससे लगाव होता गया | अपनी अपनी तरह से हम तीनों ने यह महसूस किया|
जहाँ दो मिलकर एक हो जाएँ , जब कुछ पल थम से जाएँ ,ऐसा रोमान्चित करने वाला समर्पण , रेवा सागर संगम के साक्षी को परम आनंद और शांति का अनुभव अन्यत्र कहाँ मिलेगा ?
नर्मदाजी के किनारे या छोटे से गाँव में या रास्ते में छोटे और विशाल परिसरों में बने मंदिरों, आश्रमों, सुंदर मूर्तियों का , गौशाला ,वृक्ष फुलवारी, साफ सफाई, व्यवस्था का अधिक से अधिक दर्शन – आगे जाने की कोई जल्दी नहीं – मेरे जैसे कम आस्था वाले और “ हड़बड़ी ”करने वाले व्यक्ति से ये कैसे संभव हुवा – मेरे पास कोई उत्तर नही | पुष्पा ने भी बच्चों को वस्त्र देने के बदले पहनाने को प्राथमिकता दी | पूछा – क्यों ? कहा – “ लगता है कि नर्मदाजी के बाल स्वरूप को पहना रही हूँ और पहनाने की इच्छा भी होती है और अच्छा भी लग रहा है ,फिर ऐसा अवसर कब मिलेगा | ”
श्री चेतन शाह ने नेट पर और श्री संजय श्रीवास ने सम्पूर्ण श्री नर्मदा परिक्रमा पुस्तक में परिक्रमा हेतु यथेष्ट जानकारियां दी हैं ,जिनका लाभ हमने लिया ,इसके लिए उन्हें साधुवाद |
यह संयोग ही था कि, परिक्रमा के अंतिम चरण में , तीन पुस्तकेंमिली – सौन्दर्य की नदी नर्मदा ,अमृतस्य नर्मदा और तीरे – तीरेनर्मदा | ये तीनो पुस्तकें , अनेक पुरुस्कारों से सम्मानित , जबलपुर के श्री अमृतलालजी वेगड़ , द्वारा लिखी गयी हैं | वेगड़जी ने 50 वर्ष कीउम्र में पहली बार 1977 में खंड खंड पदयात्रा शुरू की और 1999 में पूरी की | नर्मदाजी ने उन्हें ऐसी उर्जा और मनोबल दिया कि 75 वर्ष की उम्र में पदयात्रा पुनः शुरू की और अंतिम 2009 में हुई | इन पुस्तको को पढने से लगता है कि वेगड़ जी के अंतर में नर्मदाजी प्रवाहित हो रही हैं | जब मैं उनसे भेंट करना चाहता था ,तब वे अस्वस्थ थे और अस्पताल में थे | वेगड़ जी अब नहीं रहे , परन्तु उनकी पुस्तकें हर उम् और काल में नर्मदा परिक्रमा करने के लिए और विशेष कर पदयात्रा करने के लिए – भले ही खंड खंड में हो , प्रेरित करती रहेंगी |
स्कूल और कॉलेज के बाद , लेखन के नाम पर मैंने व्यवसायिक पत्र ही लिखे | साहित्यिक लेखन, शैली , अलंकृत भाषा की क्षमता मुझमे ज़रा भी न थी , न है | किसी बात की अतिशयोक्ति भी मेरे स्वभाव में नहीं है | इसलिए जो देखा , अनुभव किया , समझ में आया वही लिखा है |
परिक्रमा काल में जाने अनजाने कोई भूल ,चूक ,ग़लती हो गई हो, जो करना था नहीं किया , नहीं करना था कर दिया – इन सब के लिए माँ तू क्षमा करना |
माँ तो माँ ही होती है | जितने दिन भी माँ के पास रहे, माँ ने कोईपरेशानी नहीं होने दी , पूरा स्नेह दिया | पुरे समय ,हम तीनो उत्साहित रहे – आनंद लिया , जीवन में नया देखने समझने का अवसर मिला | किन्तु यह पूज्य बाबाजी की कृपा और आशीर्वाद के बिना कतइ संभव भी नहीं था |
वैसे तो कहने को परिक्रमा पूरी हुई ,किन्तु अब लगता है कि यह तो ट्रेलर था ,एक
लम्बी यात्रा का प्रारम्भिक परिचय था | हार्दिक
इच्छा है कि यात्रा आगे बढे ,इसकी पुनरावृति होती रहे |
पर मात्र मेरी इच्छा से क्या होगा – तभी संभव है जब माँ नर्मदा की इच्छा हो और पूज्य बाबाजी की कृपा और आशीर्वाद भी हो |
माँ नर्मदा को प्रणाम , सद्गुरु बाबाजी को प्रणाम
विशेष :पूरी परिक्रमा का विवरण इसी स्थान पर 6 जून 2019 से क्रमशः उपलब्ध होगा