account – day 9, 25.2.18 रविवार
उत्तर तट की परिक्रमा प्रारंभ – मीठीतलाई से नारेश्वर
नर्मदाजी – नील कंठ महादेव – भरूच , जानोर, नारेश्वर
जीवन में पहली बार नर्मदा परिक्रमा का विचार बना और सद्गुरु परम पूज्य बाबाजी की कृपा से वह साकार हुवा |
अमरकंटक से प्रारम्भ कर महाराजपुर, पिपरिया, होशंगाबाद , हरदा, ओम्कारेश्वर , बडवानी, शाहदा, प्रकाशा, राजपीपला ,पानेथा, हंसोट, कतपोर ,और विमलेश्वर से बोट द्वारा मीठीतलाई तक दक्षिण तट की परिक्रमा पूर्ण हुई |
छोटे छोटे गाँव, परिक्रमावासियों के प्रति श्रद्धा, सम्मान व्यक्त करने वाले लोग, देश के विभिन्न स्थानों के अन्य परिक्रमावासी , अनेकों मंदिर , साधू संत , मुस्कुराते हँसते बच्चे – यह सब और सबसे बड़ी बात माँ नर्मदा – बिलकुल शांत कहीं चंचल ,कहीं विशाल , कहीं निर्मल , कहीं कलियुगी पुत्रों की अदूरदर्शिता झेलते हुवे , भिन्न भिन्न रूपों में स्नेहसिक्त सम्मोहित आकर्षित करते हुवे , रेवा का सागर के प्रति समर्पण और सागर का रेवा को अपने में समाहित करता रेवा सागर संगम , जहाँ समय की गति रुकने की प्रतीति – जीवन का ऐसा अद्भुत अविस्मरणीय अनुभव |
रेवा सागर संगम – रेवा का अंतिम पड़ाव नहीं है , जन्म से अपने नियंता के मिलन तक जीवन से प्राप्त अनुभवों से उत्तर देने की यात्रा का प्रारम्भ है | अनुभव और आनंद की प्राप्ति में एक ही बात चुभती रही – यह बहुत पहले कर लेना था |
अब उत्तर तट की यात्रा प्रारंभ होती है
मीठीतलाई से 60 किमी दूर भरूच के लिए प्रस्थान किया | रास्ता बहुत अच्छा है | रास्ते में शुद्ध शाकाहारी होटल वैभव में भोजन किया | वहां और भी सहयात्री मिले | 5.15 बजे भरूच पहुँच कर नीलकंठ महादेव का दर्शन किया |

नर्मदा जी के किनारे पर ही बहुत बड़े परिसर में मंदिर है | यहाँ भी 100 सीढियों के बाद घाट है , नर्मदाजी का पाट बहुत बड़ा है ,प्रवाह शांत | घाट के बाद भी कीचड़ से बचने के लिए रखी बोरियों पर कुछ दूर चलने के बाद ही जल मिलता है | नर्मदा जी में जल बहुत कम होने के कारण घाट या पास में स्नान संभव नहीं था | अतः दर्शन नमन किया |
शुक्लतीर्थ
नीलकंठ महादेव मंदिर से 15 किमी पर शुक्ल तीर्थ है , छोटा सा गाँव लेकिन यहाँ बहुत से मंदिर और उनसे जुडी हुई कथाएं | प्रधान मंदिर शुक्ल नारायण मंदिर है | पटेश्वर और सोमेश्वर लिंग स्थपित हैं | नारायण की चतुर्भुज मूर्ति के दोनों ओर ब्रम्हा और शंकर जी की मुर्तियां हैं | मंदिर में ही ब्रम्हा विष्णु महेश के तीन मंदिर और तीनो के नाम में महादेव |
जानोर
शुक्ल तीर्थ से नारेश्वर के मार्ग पर जानोर है | यहाँ दत्तात्रेय जी का मंदिर है और ऊंचाई पर धर्मराज युधिस्ठिर द्वारा बनाया गया छोटा सा धर्मेश्वर मंदिर , पांडवों की गुफा भी है ,हमने दर्शन किये | सीढ़ियों से बहुत नीचे उतर कर जानोर में भी नर्मदाजी का दर्शन नमन किये | यहाँ पर भी बच्चे मिले | प्रसन्न , मुस्कुराते हुवे |

जानोर नर्मदाजी 
धर्मेश्वर मंदिर जानोर

नारेश्वर
जानोर से पालेज होते हुवे (अच्छे रास्ते से ) 40 किमी पर नारेश्वर धाम है | संध्या 6.30 पर नारेश्वर धाम पहुच गए | यहाँ स्वामी रंग अवधूतजी का आश्रम है , बहुत बड़े परिसर में फैला हुवा है | परिक्रमावासियों को निशुल्क आवास और भोजन की व्यवस्था है | कमोड युक्त कमरे हैं | व्यवस्थापक ने कहा कि परिक्रमावासियों के लिए गद्दे और पलंग नहीं बल्कि निशुल्क चटाई की व्यवस्था है | बात तो सही थी | परिक्रमावासियों को सारे सुख सुविधाओं में से कुछ तो त्याग करना ही चाहिए | लेकिन उम्र और शरीर की अपनी आदतें सीमाएं , क्षमताएं हैं, घर से बाहर उन्हें नकार देने से शारीरिक समस्याओं को भी निमन्त्रण देना ठीक नहीं है | पास ही वैकल्पिक व्यवस्था श्री रंग आशीष आवास थी जहाँ 500 रुपये रूम पेमेंट बेसिस पर रात्रि विश्राम के लिए कमरा लिया | नारेश्वर छोटा गाँव है , 2 – 3 भोजनालय हैं | अन्नपूर्णा रेस्टारेंट में भोजन किया |
आज हंसोट (5.00 बजे ) नारेश्वर (6.30 संध्या) – लगभग 266 किमी, वाया कतपोर , विमलेश्वर ,बोट से मीठीतलाई तक, (दक्षिण तट यात्रा पूर्ण) उत्तर तट यात्रा प्रारम्भ – भडोच , शुक्ल तीर्थ, जानोर पालेज – नारेश्वर रास्ता: अच्छा है जलपान : हंसोट दोपहर भोजन : भड़ोच मार्ग में होटल वैभव, रात्रि विश्राम : श्री रंग आशीष आवास नारेश्वर , भोजन : अन्नपूर्णा रेस्टारेंट


