Chronicle 2 – Narmada Parikrama

महात्म्य

कितना भी लिखा जाय , नर्मदा के महात्म्य का पूरा वर्णन नहीं किया जा सकता है  |

नर्मदा मंदिर – उद्गम

भारत में गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा , सिन्धु ,कावेरी ब्रम्हपुत्रा , कृष्णा नदियों का विशेष महत्त्व माना गया है |

नर्मदाजी का उद्गम अमरकंटक में  है | सतपुड़ा और विन्ध्य पर्वत की फैली हुई श्रृंखला को मैकल पर्वत भी कहा जाता है | नर्मदाजी को मेकलसुता और रेवा के नाम से भी जाना जाता है |

नर्मदा को वैराग्य की अधिष्ठात्री माना गया है | नर्मदा के किनारे अनेकों दिव्य तीर्थ , ज्योतिर्लिंग ,उपलिंग, मंदिर स्थापित हैं | नर्मदा  भारत ही नहीं , विश्व की एकमात्र नदी ,जिसकी परिक्रमा की जाती है | इसकी एक विशेषता यह भी है कि दक्षिण भारत के पठार की अन्य नदियों विपरीत पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है

नर्मदा जी भगवान शंकर की पुत्री है ,जो उनके नीलकंठ से निसृत हुई है | भगवान शंकर ने वरदान दिया कि तुम चिरकुंवारी रहोगी, जो फल तीर्थों में स्नान करने से होता है , वह तुम्हारे दर्शन मात्र से होगा ,गंगा के सामान महात्म्य होगा, मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगा | वर्ष में एक बार गंगाजी भी नर्मदा में स्नान करने आती हैं |

परिक्रमा में अमरकंटक और ओम्कारेश्वर ये दो महत्वपूर्ण स्थान माने गए हैं | चिरकाल से , साधू , सन्यासी , ऋषि , संत , महात्मा नर्मदाजी के किनारे तपस्या करते रहे हैं | चिरकाल से ही नर्मदाजी की परिक्रमा होती रही है | अब लोग साधनों से भी यात्रा करने लगे हैं |

परिक्रमा वासियों को कभी भी कोई  कष्ट नहीं होता , भोजन आदि का प्रबंध सहज ही हो जाता है – माँ की ऐसी कृपा है |

जहाँ भी नर्मदाजी है  , वहां से परिक्रमा प्रारंभ कर वहीँ  पूर्ण की जाती है | अधिकतर लोग अमरकंटक या ओम्कारेश्वर से प्रारंभ करते हैं | वैसे तो परिक्रमा के बहुत नियम हैं | मुख्य रूप से – परिक्रमा के दौरान नर्मदाजी को लांघना नहीं है , नर्मदाजी हमेशा दाहिनी ओर रहना चाहिए, जहाँ नर्मदाजी नहीं हों वहां नर्मदा जल का  दर्शन पूजन करना चाहिए, अनर्गल बातें न करे , नर्मदे हर नर्मदे हर का उच्चारण या मानसिक जप , गुरु मन्त्र का जप करना चाहिए , सादा भोजन करें,  |

परिक्रमा के समय जो अनुभव होते हैं , उन पर विचार करें ,आत्मसात करें , जीवन में परिवर्तन की सम्भावना बनती है |

परिक्रमा यात्रा पूर्ण करने के बाद रेवा संगम ( रेवा सागर / अरब सागर) से लाये हुवे जल को ओम्कारेश्वर में ज्योतिर्लिंग पर अर्पण किया जाता है , तभी परिक्रमा परिपूर्ण होती है |

अक्टोबर से अप्रेल मई तक यात्रा की जाती है | शिवरात्रि के बाद मौसम अधिक अनुकूल रहता है |

नर्मदे हर

त्वदीय पाद पंकजम् , नमामि देवी नर्मदे

विशेष : यात्रा के पहले दिन का वर्णन 13 जून 2019 , इसी स्थान पर देखिये .