account – day 9 , 25.2.18 रविवार
हंसोट / विमलेश्वर से मीठीतलाई (रेवा संगम)
हंसोट गेस्ट हाउस में जलपान की व्यवस्था कर दी गई थी | कतपोर से विमलेश्वर 6 किमी है, बीच में कोटेश्वर महादेव के दर्शन किये और विमलेश्वर 6 बजे पहुंच गए | विमलेश्वर के मंदिर में ही , माँ नर्मदा जी (जल) की पूजा , आरती व प्रसाद वितरण किया | मंदिर की आरती का भी आनन्द लिया |
बताते हैं की विमलेश्वर में इंद्र, , रीश्यभ्रिंग , सूर्य, ब्रम्हा, शिव जी ने तप किया था |
रात्रि को जो बहुत यात्री आये थे, लोगों ने यहां और ईश्वर भाई के यहाँ विश्राम किया | सुबह रामजी भाई (9723752855), ईश्वर भाई ( 9662601816) भी उपस्थित थे | मंदिर में जहाँ यात्री एकत्र हुए थे ,वहां से लगभग 3 – 4 किमी दूर पर बोट के लिए जाना था | छोटी छोटी बालिकाएं समुद्र की यात्रा की मंगल कामनाओं के साथ सिर पर जल का कलश लेकर खड़ी थीं |

आगे सड़क बनाने के लिए गिट्टी और गिट्टी के ढेर पड़े थे | वाहन इसके आगे नहीं जा सकते थे | ऐसा बताया गया कि कुछ समय पूर्व कांग्रेस के एक नेता की नर्मदा की पद यात्रा के दौरान गिट्टी बिछाई गयी थी , अन्यथा लगभग कीचड़ ही रहता है | वहां से सभी यात्रियों को लगभग 2 किमी, जहाँ बोट खड़ी रहती हैं , तक पैदल ही जाना था |

सामान के साथ गिट्टी 
और कीचड़ पर नंगे पांव
7 बजे पैदल ही प्रस्थान हुवा | समुद्र या नदी के किनारे जैसे बोट खड़ी रहती हैं , घाट बने रहते हैं ,वैसी कल्पना के विपरीत , ज़मीन से लगभग 10 फुट नीचे नहर नुमा नाली , कीचड़, में 9 – 10 बोट खड़ी थीं | बताया गया कि जब यहाँ पानी आ जायेगा तो बोट चलेंगी |
कुछ पुरुष महिलाओं ,वृद्धों को गिट्टी और कहीं कीचड़ पर ,नंगे पांव और बिना चप्पल जूते देख कर लगता था की पैदल चलना भी इनको ज़रा भी कठिन नहीं लग रहा है | दर्द थकान परेशानी का कोई भी संकेत इनके चेहरों पर नहीं दिखता , बल्कि नर्मदाजी का समुद्र मिलन देखने की उत्कंठा और उत्साह है | मन में ही आवाज़ आयी (बिना श्रद्धा के नाथ हजारों मैंने अर्ध्य चढ़ाये हैं , दिखा दिखा कर इस दुनिया को धर्मी भी कहलाये हैं, ) श्रद्धा तो इनकी है, हम लोगों का तो मात्र दिखावा है |
यात्रा में जितना अधिक कष्ट और असुविधा , उतना ही आगे बढ़ने का उल्लास ,शक्ति और आनंद | ऐसी यात्राओं का अपना अलग ही आनन्द है ,वह आनंद सुविधा जनक घरो में तो कदापि भी नहीं मिल सकता | यह अनुभव मेरी पूर्व की, अमरनाथ, , तुंगनाथ, मुक्ति नारायण ,की सपत्नीक यात्रायें और पूज्य बाबाजी के साथ मणिमहेश और मानसरोवर की यात्राओं में भी हुवा है |
बोट चलने की प्रतीक्षा करते हुवे , लगभग 400 से अधिक यात्री भजन कीर्तन ,बातचीत , आपस में परिचय करते रहे | महाराष्ट्र से सबसे अधिक , फिर गुजरात , मध्य प्रदेश व कम संख्या में अन्य प्रदेशों के , साधारण से लेकर उच्च वर्ग तक सभी तरह के यात्री थे , साधू संत भी थे | मुंबई के आतुरालय सेवा संस्थान से जुड़े हुवे आष्टीकर व उनके परिवार के सदस्य थे जिन्होंने ओंकारेश्वर से परिक्रमा प्रारंभ की थी | अन्य महिलाये पुरुष भी काफ़ी संख्या में थे |

बोट की 
प्रतीक्षा में
लगभग 2 घंटों के बाद वहां पानी आ गया तब रामजी भाई ने बोट में यात्रियों को बैठने के लिए कहा | 8 -10 फीट नीचे बोट तक जाने के लिए , बांस के टुकड़ों और घास से पुल नुमा रास्ता बना दिया गया था | एक के बाद एक यात्री , बांस के पुल पर से कीचड़ में गिरते पड़ते ,बोट में बैठने लगे |

एक एक बोट में 40 से लेकर 68 यात्री बिठाये गये | लाइफ जेकेट या सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं थी | लेकिन किसी के चेहरे पर कोई भय, शिकायत का भाव नहीं | एक बोट में हरदा के 26 ,और सनावद के 10 एवं अन्य परिक्रमावासीयों के साथ हम दोनों भी बैठे | 9 से 10 बोट चलती हैं और रोज़ लगभग 400 से 500 यात्री हो जाते हैं |

जिन यात्रियों के अपने वाहन थे , उन वाहनों को रामजी भाई , ईश्वर भाई ने व्यवस्था कर विमलेश्वर से मीठीतलाई भेज दिया | मीठितलाई में वे वाहन मिल जायेंगे | हमारे वाहन को मीठितलाई तक ले जाने के लिए रामजी भाई ने लोकनाथ के साथ एक व्यक्ति की व्यवस्था कर दी |
मीठीतलाई
लगभग 10 बजे बोटों को एक के बाद एक रवाना किया गया | थोड़ी देर बाद किनारे ओझल हो गए और केवल जल ही जल और आगे पीछे बोट | नर्मदे हर का लगातार उद्घोष पुरुषों द्वारा तो महिलाओं की भजन कीर्तन में निरंतरता देखने लायक थी | साढ़े तीन घंटो के बाद मीठितलाई पहुँचे | धूप तेज हो गयी थी | मीठितलाई के लगभग आधे घंटे पूर्व बोट वालों ने नर्मदा जी का समुद्र में संगम स्थल बताया | बोट वहां रोक दी गयी | अमरकंटक में पतली धारा जैसा बाल रूप और यहाँ बहुत विशाल भव्य रूप | सचमुच नर्मदाजी समुद्र में समाहित हो गयी | दर्शन कर धन्य ,कृतार्थ हुये | पूज्य बाबाजी की कृपा आशीर्वाद का ध्यान आया ,उसके बिना यह कैसे संभव था, और आँखे नम हो गयी | कुछ क्षण आँखे बंद कर , माँ को नमन करते हुवे – बाबाजी , परिवार के दिवंगत और वर्तमान सभी सदस्यों को याद किया कि वे भी इस समय दर्शन नमन कर रहे हैं | बाबाजी को पुनः प्रणाम किया |
बोट के सहयात्री भी हाथ जोडकर नमन कर रहे थे | संगम के जल को सभी ने मस्तक पर चढ़ाया , आचमन किया, पूजा की | साथ में लाये हुवे कुछ जल को यहाँ अर्पण किया और संगम का जल लिया | सभी ने माँ को नमन किया पूजा की आरती व प्रसाद वितरण किया | नर्मदा मैया की जय, नर्मदे हर ,नर्मदे हर का उद्घोष होता रहा | बहुत अच्छा लगा | माँ से प्रार्थना की कि दुबारा भी यह अवसर देवें | उस क्षण की स्मृति से आज भी तन मन रोमांचित हो जाता है | आज भी प्रार्थना है कि माँ फिर से यह अवसर देना |
जहाँ अस्तित्व शेष न हो, मिलन हो, संगम हो ,समर्पण हो, दो मिलकर एक हो जाएँ , वहां परम आनंद और शांति के अतिरिक्त हो भी क्या सकता है ? शांत समुद्र , दोपहर 1.30 बजे तेज़ धूप अपने आप शीतल हो गई , नर्मदे हर नर्मदे हर के उद्घोष को अपनी मस्ती में समेटे बहती शीतल बयार , ह्रदय में गूंजता हुवा मिलन संगीत और उस मिलन समर्पण के प्रत्यक्ष साक्षी हम – अविस्मरणीय क्षण – न जाने कहाँ खो गए – आनंद और सौभाग्य और किसे कहते हैं ?
और बोट जब फिर से चलने लगी तब अपने आपे में आये | सब लोग कहने लगे – रुको रुको ,थोड़ी देर और रुको | लेकिन क्या ऐसे पल रुकते हैं ? बोट आगे बढ़ चुकी थी |
फिर मिठीतलाई पर जहाँ बोटों को रोका गया , वहां घुटने तक कीचड़ था | कुछ बोट जो पहले रुक गयी थीं वहां कमर तक कीचड़ था | बोट से बंधे हुवे एक टायर और बोट वाले का सहारा ले कर उतरा गया | रोज़ लगभग 400 – 500 परिक्रमावासी यात्री आते हैं , बोट पर चढ़ने और उतरने की शासन उचित व्यवस्था क्यों नहीं करता | वृद्ध और महिलाओं के लिए बहुत असुविधा जनक था | उतरने के बाद भी कीचड़ और पानी में ही 150 – 200 फ़ुट पैदल चलना पड़ता है |

वहां अपने अपने वाहन , बस आदि मिल जाते हैं | जागेश्वर ग्राम वहीँ एक आश्रम ,कुंवा हाथ पैर धोने की व्यवस्था थी |





