Chronicle -15 Narmada Parikrama

account – day 12 , 28.2.18 बुधवार

मांडव से बडवाहा

नर्मदाजी  : महेश्वर, मंडलेश्वर, बडवाहा

मांडव मे रेवा कुंड के दर्शन किये | लोगों का विश्वास है कि रेवा कुंड में नर्मदाजी का जल आता है | इसलिए परिक्रमावासी कुंड में स्नान / दर्शन करने अवश्य आते हैं | बताते हैं कि रानी रूपमती नित्य नर्मदाजी के दर्शन करने के बाद ही अन्न जल ग्रहण करती थी | सुविधा की दृष्टि से रेवा कुंड का निर्माण किया गया | वर्षा ऋतू में रेवा कुंड पूरा भर जाता है | महाराष्ट्र से बस से आये हुवे परिक्रमा वासी कुंड में स्नान पूजा कर रहे थे, और पास ही  जलपान भोजन बन रहा था | रेवा कुंड के बाद नीलकंठ पेलेस के  दर्शन , जलपान कर , हमने महेश्वर के लिए प्रस्थान किया |

रेवा कुंड

दुधी धामनोद

महेश्वर जाने  के मार्ग में दुधी धामनोद ग्राम में थोड़ी ऊंचाई पर एक भव्य मंदिर दिखाई दिया | वहां पहुँचने पर अत्यंत प्रसन्नता हुई | विशाल परिसर में श्री राज राजेश्वरी उपासना केंद्र  है | ललिता महात्रिपुर सुंदरी , गणेशजी, राम दरबार कृष्णजी व अन्य मंदिरों के दर्शन , गौशाला , नवग्रह हवन कुंड, और विद्यार्थियों द्वारा संस्कृत पाठ  पुरे वातावरण में  पवित्रता  और भव्यता  की वृद्धि कर रहे थे | कुछ समय वहां रुके ,  बहुत अच्छा लगा | आज भी स्मृति बनी हुई है | महेश्वर के लिए प्रस्थान किया |

दुधी धामनोद राज राजेश्वरी धाम

महेश्वर

नर्मदाजी महेश्वर

महेश्वर में नर्मदाजी की विशालता , स्वच्छ , विपुल , जल राशी , बड़े बड़े  सुन्दर साफ सुथरे घाट हैं | और गहराई ज्यादा होने के कारण सुरक्षा की दृष्टि से स्नान के लिए चैन लगी है ताकि माँ की गोद में सुरक्षित स्नानकर सकें | , स्नान के बाद पूजन , प्रसाद वितरण | फिर भगवान बांके बिहारी के मंदिर में शुद्ध पवित्र गरमा गरम भोजन – ठाट ही ठाट – क्या कहना |

महेश्वर में ही राज राजेश्वरी मंदिर  , महाप्रभु जी की बैठक , शिव लिंग जिनकी पूजा स्वयं रानी करती थीं  , रानी अहिल्या बाई होल्कर के महल किला , व्यवस्था  सब कुछ  अद्वितीय है | होल्कर घराने का इतिहास – सब के दर्शन किये | महेश्वर का पुराना नाम माहिष्मती पुरी है | इसे गुप्त काशी भी कहा जाता है और काशी के सामान ही इसका महत्व है |

मंडलेश्वर  

महेश्वर से बड़वाहा ,के मार्ग में एक स्थान मंडलेश्वर आता है , यह जिला भी है | यहाँ भी नर्मदा जी के  दर्शन , राम मंदिर ,काल भैरव मंदिर , छप्पन देव मंदिर के दर्शन के बाद गुप्तेश्वर मंदिर के दर्शन भी किये | ऐसा कहा जाता है कि जगत्गुरू श्री शंकराचार्य जी एवं परम  विद्वान मंडन मिश्र जीके बीच यहाँ शास्त्रार्थ हुवा था जिसमे मंडन मिश्र जी की पराजय हुई | तब उनकी विदुषी पत्नी भारती देवी  ने शंकराचार्य जी से शास्त्रार्थ किया | भारती  देवी ने जगतगुरु से काम संबंधित प्रश्न पूछे , तब जगतगुरु ने छह माह का समय माँगा था ,और इस काल के लिए उसी स्थान पर समाधी ली थी | परिक्रमा  के दौरान अति सहजता से ऐसे ऐतिहासिक , पौराणिक स्थानों का दर्शन लाभ भी हुवा |

बडवाहा

संध्या लगभग 5.30 बजे बडवाहा , हरी ॐ आश्रम पहुँचे | पूज्य संत भागवतानन्द जी महाराज , पूज्य बाबाजी के साथ के ही हैं और बाबाजी से बहुत स्नेह रखते हैं| खूब भजन करते हैं | दर्शन कर प्रणाम किया | पूज्य बाबाजी की कृपा से स्वामी जी ने आश्रम में ही हमारी व्यवस्था कर दी | विशाल आश्रम में मंदिर  , संतों व परिक्रमा वासियों के  आवास भोजन की पूर्ण व्यवस्था है | संध्या में खेडीघाट पर नर्मदा जी के दर्शन किये | रात्रि में आश्रम  में संतों ने भजन किया हमें भी उपस्थित रहने का सौभाग्य प्राप्त हुवा |

आज मांडव (10 बजे ) बडवाहा ( 5.30 बजे ) लगभग 120 किमी वाया  दुधी धामनोद. महेश्वर. मंडलेश्वर , रास्ता अच्छा जलपान – मांडव ,  दोपहर भोजन : बांके बिहारी मंदिर , महेश्वर , रात्रि भोजन विश्राम –हरिओम आश्रम बडवाहा डीज़ल – मांडव

विशेष: अगला विवरण 4.8.19 को देखिये

Chronicle -14 Narmda Parikrma

account -day 11, 27.2.18 मंगलवार

गरुडेश्वर से मांडव

नर्मदा  : गरुडेश्वर,  कोटेश्वर (निसारपुर) मनावर

आज 27  फरवरी मंगलवार , यात्रा का ग्यारहवाँ दिन | प्रातः दत्त संस्थान  मंदिर परिसर से लगे हुवे घाट पर नर्मदा स्नान ,पूजन किया | दत्त मंदिर, नार्देश्वर मंदिर, श्री  वासुदेवानंद  सरस्वती समाधी का दर्शन  किया  |

जलपान के पश्चात हांपेश्वर (76किमी) के लिए प्रस्थान किया | कवांट और कड़ीपानी  होते हुवे हांपेश्वर पहुँचे | सरदार सरोवर बाँध के कारण पुराना  मंदिर डूब गया है इसलिए पुनर्स्थापित जो बहुत ही सुंदर मंदिर है ,आगे भी  निर्माण होरहा है  , दर्शन किये | कड़ीपानी से हांपेश्वर 6 किमी पहाड़ी रास्ता है |

हान्फेश्वर मंदिर

हांपेश्वर से वापिस कड़ीपानी  और कवांट से  चकताला ,चकताला  से अलीराजपुर मार्ग पर , अलीराजपुर के  5 किमी पहले एक परिसर में बहुत पुराना किन्तु बारीक़ नक्काशी और कारीगिरी का एक मंदिर दिखाई दिया  | कुछ समय वहां  रुके | संभवतः पुरातत्व विभाग के अंतर्गत है ,किन्तु वहां किसी भी प्रकार की कोई जानकारी नहीं मिली | अलीराजपुर में भोजन किया |

अलीराजपुर से 5 किमी पहले

फिर कुक्षी से आगे  निसरपुर के निकट नर्मदा जी का दर्शन ,नमन किया |  और कोटेश्वर महादेव के दर्शन किये |

निसारपुर से प्रस्थान कर मनावर पहुँचे | मनावर मंदिर में परिक्रमा वासियों के लिए सदाव्रत व्यवस्था है | वहां के व्यवस्थापक ने रात्रि विश्राम के लिए हमें कहा |

मनावर मंदिर

मनावर  में मंदिर के दर्शन कर धरमपुरी होते हुवे माँडव के लिए संध्या लगभग 6 बजे प्रस्थान किया | अँधेरा हो गया था ,रास्ता ठीक है –ऐसा बताया गया किन्तु  रास्ता बहुत ही ख़राब था | धीरे धीरे रात्रि लगभग 9 बजे मांडव पहुँच कर जैन मंदिर में विश्राम किया | यह भी अनुशाषित बहुत बड़ा परिसर , सभी सुविधाओं के साथ उपलब्ध है | मांडव में  शुद्ध शाकाहारी भोजनालय में भोजन किया  |

आज गरुडेश्वर (10 बजे) से मांडव (रात्रि 9 बजे) , कुल 300 किमी वाया नसवाडी, कावंत , कड़ीपानी , हांपेश्वर, अलीराजपुर, कुक्षी, निसारपुर, मनावर, धरमपुरी  मांडव , रास्ता धरमपुरी से मांडव बहुत ख़राब था | भोजन : अलीराजपुर , रात्रि विश्राम – जैन भवन मांडव डीज़ल – गरुडेश्वर

विशेष:बारहवें दिन का विवरण 3.8.19 को देखिये

Chronicle -13 Narmada Parikrama

account- Day 10, 26.2.18 सोमवार

नारेश्वर से गरुडेश्वर

नर्मदाजी : नारेश्वर , मालसर, , बदरिका आश्रम , चाणोद , करनाली , तिलकवाडा   

          नारेश्वर – स्वामी श्री रंग अवधूत सेवा संस्थान

श्री रंग आशीष आवास से 1 किमी पर ही विशाल नर्मदाजी हैं | रास्ते में और नर्मदाजी के किनारे पर बोर्ड  लगे थे कि नदी में मगर मच्छ हैं, सावधान रहें | नर्मदाजी का वाहन मगर ही है | बहुत सी सीढियाँ उतरने के बाद , कीचड़ नहीं था ,घुटने तक जल और वह भी क्रिस्टल क्लियर | लम्बी जीवन यात्रा की सीढ़ियों पर उतरते चढ़ते व्यवहारों और  अनुभवों के बाद व्यक्ति का ह्रदय भी तो शांत और निर्मल हो जाना चाहिये |  

माँ की गोद में बैठकर स्नान करने का बहुत आनंद आया | खुले मैदान में खाने पीने के बहुत से स्टाल लगे थे | इस समय सभी खाली थे , कपड़े बदलने की सुविधा भी थी | देखा कि पास के गाँव से लोग यहाँ लोग फेरी (बोट) से आ रहे हैं | स्नान के बाद पूजा , आरती और प्रसाद वितरण किया |

छोटे से गाँव में जहाँ कोई बड़ा व्यवसाय उद्योग नहीं है,  आश्रम और नर्मदाजी के बीच रास्ते में बहु मंजिली इमारतों में अनेकों खाली फ्लैट दिखे | बताया गया कि सभी फ्लैट गुजरात ,महाराष्ट्र अन्य स्थानों के  लोगों ने खरीद लिए हैं  और जब आश्रम में कोई उत्सव या कार्यक्रम होता है तो हजारों श्रद्धालुओं के रहने की व्यवस्था यहाँ की जाती हैं | संतो पर नर्मदा जी की कृपा और जन समुदाय की ऐसी श्रद्धा भारत के अतिरिक्त और कहाँ मिलेगी |

स्नान के बाद श्री रंग अवधूत सेवा संस्थान का दर्शन किया | स्वामी रंग अवधूत जी  का जन्म 21 नवम्बर 1898 बड़ोदा में हुवा | स्वामी वासुदेवानान्दजी सरस्वती उनके आध्यात्मिक गुरु थे | स्वामी रंग अवधूत जी ने नर्मदा परिक्रमा की और नारेश्वर में ही नर्मदाजी के तट पर सेवा प्रकल्प ले कर रम गए | 19 नवम्बर 1968 को हरिद्वार में शरीर छोड़ा | उनके अनुयायी उन्हें भगवान् दत्तात्रेय का अवतार मानते हैं | 21 नवम्बर 68 को उनके पार्थिव  शरीर को नारेश्वर लाया गया | अंतिम  संस्कार किया गया |

भगवान दत्ता त्रय अवतार श्री रंग अवधूत स्वामी

श्री रंग अवधूत संस्थान  आश्रम बहुत बडे परिसर में फैला हुवा है | स्वच्छ शांत अनुशाषित वातावरण  है – ध्यान मंदिर भी है | वहां के शिलालेखों से ऐसी जानकारी मिलती है कि  रंग अवधूत जी अपनी माता के आदेश को सुप्रीमकोर्ट के आदेश की तरह मानते थे | मंदिर या किसी भी स्थल पर पैसे देने या रखने की स्पष्ट मनाई लिख कर की गई है | जो भी देना है , कार्यालय में दिया जाता है और उसकी रसीद दी जाती है |आश्रम में सभी जगह केवल गुजराती भाषा में ही जानकारियां लिखी गई हैं | मैंने व्यवस्थापक से निवेदन किया कि अन्य भाषा के दर्शनार्थी भी आते हैं , अतः हिंदी में भी लिखा जावे |

सुबह 11.00 बजे और संन्ध्या 7.00 बजे आश्रम में निशुल्क भोजन व्यवस्था है | हमें भी भोजन प्रसाद  हेतु आमंत्रित किया गया | नर्मदा जी को भोग लगा हलुवा ,दाल चावल सब्जी इतना स्वादिष्ट और गरम भोजन आज भी याद है | माँ की कृपा हुई तो दुबारा भी यह प्रसाद प्राप्त करेंगे | उसी दिन किसी स्कूल से सैंकड़ों विकलांग, सूरदास विद्यार्थी आये थे | सभी दर्शनार्थियों को निशुल्क  भोजन दिया जाता है | भोजन प्रसाद प्राप्ति के बाद प्रस्थान किया |

मालसर

बद्रीका आश्रम से गरुडेश्वर के मार्ग पर , नर्मदाजी के उत्तर तट पर  मालसर है वहां  भी कुछ समय के लिए रुके | अंगारेश्वर ,शिव मंदिर, पांडू तीर्थ तथा अयोनिज तीर्थ  है | अयोनिज ऋषि की तपोभूमि है | राजा पांडू और मंगल ग्रह ने तप किया था | यहाँ  डोंगरे महाराज का  बहुत बड़ा  आश्रम है ,जहां , पूर्व सूचना के आधार पर रुकने  भोजन की व्यवस्था हो जाती है | सत्संग , भजन कार्यक्रम चलते रहते हैं |

मालसर नर्मदाजी

अनुसूया माता मंदिर

नारेश्वर से लगभग 57 किमी अनुसूया में अनुसूया माता का मंदिर है , जहाँ अनुसूया माता ने तपस्या की थी | तपस्या के  फलस्वरूप माता अनुसूया को ब्रम्हा के तेज से चन्द्र,  , विष्णु के तेज से दत्तात्रेय  व् महेश के तेज से दुर्वासा पुत्र रूप में प्राप्त हुवे | मंदिर में ही छोटा सा किन्तु बहुत गहरा कुंवा है , कहते है की माता की तपस्या के कारण गंगा जी भी यहाँ आई |

अनुसूया माता मंदिर

बदरिका आश्रम

अनुसुया माता मंदिर से बदरिका आश्रम गए | बहत ही सुंदर मंदिर है, परिसर बहुत बड़ा है, शंकर जी  और हनुमान जी की विशालकाय मूर्तियां  है, सामने ही  नर्मदा जी हैं | ऐसे सुंदर भव्य परिसर, दृश्य  ,शांत वातावरण , मन करता है  यहीं रुक जाएँ | माँ से हर जगह प्रार्थना कर रहे थे , माँ दुबारा फिर अवसर देना |

चांदोद

बदरिका आश्रम से  चांदोद (चाणोद)  गए , वहां भी नर्मदा जी है | इसे त्रिवेणी संगम भी कहा जाता है | प्रातः नारेश्वर में नर्मदा स्नान किया था , किन्तु यहाँ माँ की विशालता देख कर पुनः मन हुवा और स्नान किया , नमन किया | चांदोद में   शेष नारायण, बालाजी , आदि कई मंदिर हैं ऋणमुक्तेश्वर ,कपिलेश्वर महादेव  के दर्शन किया  | यहाँ सात तीर्थ – चंड आदित्य ,चंडिका देवी, चक्रतीर्थ (कहते हैं तालमेघ दैत्य को मारकर भगवान विष्णु ने यहाँ नर्मदाजी में अपना चक्र धोया था ), कपिलेश्वर, (कपिल भगवान ने तप किया था ) ऋणमुक्तेश्वर ,पिंगलेश्वर (अग्नि देवता ने तप किया था ) और  नंदाल्हद हैं |

कपिलेश्वर महादेव मंदिर चांदोद

करनाली

चांदोद से करनाली जहाँ ओर नदी का नर्मदा जी में संगम होता है – लोग पश्चिम प्रयाग भी कहते हैं | सोमेश्वर तीर्थ है | कुबेर भंडारी , नर्मदा माँ  व अग्नि देब भगवान  सूर्य देव का मंदिर है | बड़े बड़े परिसर साफ सुथरे  , आवास सुविधा  और भोजन की व्यवस्था , देखकर मन प्रसन्न हो जाता है |

त्रिवेणी संगम करनाली

तिलकवाडा

फिर तिलकवाडा , मणि नदी के किनारे है , यहाँ गौतम ऋषि ने तप किया था, मणितीर्थ कहा जाता है | तिलकवाडा में वासुदेवानंद सरस्वती मंदिर में दर्शन किये , जो रंग अवधूत स्वामीजी  के गुरु थे | यहाँ की  भव्यता , सौन्दर्य आज भी मन मस्तिष्क पर अंकित है | गरुडेश्वर के लिए प्रस्थान किया |

तिलकवाडा

नारेश्वर से गरुडेश्वर लगभग 150 किमी की यात्रा , मार्ग में सभी दर्शन करते हुवे लगभग 8 घंटों में पूरी की | गरुडेश्वर में श्री दत्तात्रेय मंदिर और स्वामी वासुदेवानन्द सरस्वतीजी  की समाधी भी है | स्वामी कार्तिक की तपो भूमि – कुमारेश्वर तीर्थ है | श्री दत्त संस्थान में नई और पुरानी विंग  में न्यूनतम पेमेंट पर सुंदर सुविधाजनक आवास एसी नान एसी कमरे , बड़े बड़े हाल 4 से 6 पलंग लगे हुवे उपलब्ध हैं | रात्रि में मंदिर में ही स्वादिष्ट गर्म भोजन प्राप्त किया  | पूरा संस्थान नर्मदा जी के तट पर ही है |

आज नारेश्वर  (11.30 ) गरुडेश्वर (7.30)  लगभग 150 किमी, वाया मालसर, अनुसूया , बदरिका आश्रम , चाणोद , करनाली , , तिलकवाडा     रास्ता: अच्छा है भोजन : श्री रंग अवधूत आश्रम रात्रि विश्राम व् भोजन : श्री दत्त सेवा संस्थान , गरुडेश्वर

विशेष : ग्यारवें दिन का विवरण 3.8.19 को देखिये

       

Chronicle -12 Narmada Parikrama

account – day 9, 25.2.18 रविवार

उत्तर तट की परिक्रमा प्रारंभ – मीठीतलाई  से  नारेश्वर

नर्मदाजी – नील कंठ महादेव – भरूच , जानोर, नारेश्वर

जीवन में पहली बार नर्मदा परिक्रमा का विचार बना और सद्गुरु परम पूज्य बाबाजी की कृपा से वह साकार हुवा |

अमरकंटक से प्रारम्भ कर महाराजपुर, पिपरिया, होशंगाबाद , हरदा, ओम्कारेश्वर , बडवानी, शाहदा, प्रकाशा, राजपीपला ,पानेथा, हंसोट, कतपोर ,और विमलेश्वर से बोट द्वारा मीठीतलाई तक दक्षिण तट की परिक्रमा पूर्ण हुई |

छोटे छोटे गाँव, परिक्रमावासियों के प्रति श्रद्धा, सम्मान व्यक्त करने वाले लोग, देश के विभिन्न स्थानों के अन्य परिक्रमावासी , अनेकों मंदिर , साधू संत , मुस्कुराते हँसते बच्चे – यह सब और सबसे बड़ी बात माँ नर्मदा – बिलकुल शांत कहीं चंचल ,कहीं विशाल , कहीं निर्मल , कहीं कलियुगी पुत्रों की अदूरदर्शिता झेलते हुवे , भिन्न भिन्न रूपों में स्नेहसिक्त सम्मोहित आकर्षित करते हुवे , रेवा का सागर के प्रति समर्पण और सागर का रेवा को अपने में समाहित करता रेवा सागर संगम , जहाँ समय की गति रुकने की प्रतीति – जीवन का ऐसा अद्भुत अविस्मरणीय अनुभव |

रेवा सागर संगम – रेवा का अंतिम पड़ाव नहीं है , जन्म से अपने नियंता के मिलन तक जीवन से प्राप्त अनुभवों से उत्तर देने की यात्रा का प्रारम्भ है | अनुभव और आनंद की प्राप्ति में एक ही बात चुभती रही – यह बहुत पहले कर लेना था |

अब उत्तर तट की यात्रा प्रारंभ होती है

मीठीतलाई से 60 किमी दूर भरूच के लिए प्रस्थान किया | रास्ता बहुत अच्छा है | रास्ते  में शुद्ध शाकाहारी होटल वैभव में भोजन किया | वहां और भी सहयात्री  मिले | 5.15 बजे भरूच पहुँच कर नीलकंठ महादेव का दर्शन किया |

नीलकंठेश्वर महादेव

नर्मदा जी के किनारे पर ही बहुत बड़े परिसर में मंदिर है | यहाँ भी 100 सीढियों के बाद घाट है , नर्मदाजी का पाट बहुत बड़ा है ,प्रवाह शांत | घाट के बाद भी कीचड़ से बचने के लिए रखी बोरियों पर कुछ दूर चलने के बाद ही जल मिलता है | नर्मदा जी में जल बहुत कम होने के कारण घाट या पास में स्नान संभव नहीं था | अतः दर्शन नमन किया |

शुक्लतीर्थ

नीलकंठ महादेव मंदिर से 15  किमी पर  शुक्ल तीर्थ है , छोटा सा गाँव लेकिन यहाँ बहुत से मंदिर और उनसे जुडी हुई कथाएं | प्रधान मंदिर शुक्ल नारायण मंदिर है | पटेश्वर और  सोमेश्वर लिंग स्थपित हैं | नारायण की चतुर्भुज मूर्ति के दोनों ओर ब्रम्हा और शंकर जी की मुर्तियां हैं | मंदिर में ही ब्रम्हा विष्णु महेश के  तीन मंदिर और तीनो के नाम में महादेव |

जानोर

शुक्ल तीर्थ से  नारेश्वर के मार्ग पर जानोर है | यहाँ दत्तात्रेय जी का मंदिर है और  ऊंचाई पर  धर्मराज युधिस्ठिर द्वारा बनाया गया छोटा सा धर्मेश्वर मंदिर , पांडवों की गुफा भी है ,हमने दर्शन किये | सीढ़ियों से  बहुत नीचे उतर कर जानोर में भी नर्मदाजी का दर्शन नमन किये | यहाँ पर भी बच्चे मिले | प्रसन्न , मुस्कुराते हुवे |

जानोर

नारेश्वर

जानोर से पालेज होते हुवे (अच्छे रास्ते से ) 40 किमी पर नारेश्वर धाम है | संध्या 6.30 पर नारेश्वर धाम पहुच गए | यहाँ स्वामी रंग अवधूतजी का आश्रम है , बहुत बड़े परिसर में फैला हुवा है | परिक्रमावासियों को निशुल्क आवास और भोजन की व्यवस्था है | कमोड युक्त कमरे हैं | व्यवस्थापक ने कहा कि  परिक्रमावासियों के लिए गद्दे और पलंग नहीं बल्कि निशुल्क  चटाई की व्यवस्था है | बात तो सही थी | परिक्रमावासियों को सारे सुख सुविधाओं में  से कुछ तो त्याग करना ही चाहिए | लेकिन उम्र और शरीर की अपनी आदतें सीमाएं , क्षमताएं हैं, घर से बाहर  उन्हें नकार देने से शारीरिक समस्याओं को भी निमन्त्रण देना ठीक नहीं है | पास ही वैकल्पिक व्यवस्था श्री रंग आशीष आवास थी  जहाँ 500 रुपये रूम पेमेंट बेसिस पर रात्रि विश्राम के लिए कमरा लिया | नारेश्वर छोटा गाँव है , 2 – 3 भोजनालय हैं |  अन्नपूर्णा रेस्टारेंट में भोजन किया |

आज हंसोट (5.00 बजे ) नारेश्वर  (6.30 संध्या) – लगभग 266 किमी, वाया कतपोर , विमलेश्वर ,बोट से मीठीतलाई तक, (दक्षिण तट यात्रा पूर्ण) उत्तर तट यात्रा प्रारम्भ – भडोच , शुक्ल तीर्थ, जानोर पालेज – नारेश्वर      रास्ता: अच्छा है जलपान : हंसोट दोपहर भोजन : भड़ोच मार्ग में होटल वैभव,  रात्रि विश्राम : श्री रंग आशीष आवास नारेश्वर  , भोजन : अन्नपूर्णा रेस्टारेंट

विशेष : क्रॉनिकल 13 ,दसवें दिन का विवरण दिनांक 3.8.19 को देखिये