Chronicle -12 Narmada Parikrama

account – day 9, 25.2.18 रविवार

उत्तर तट की परिक्रमा प्रारंभ – मीठीतलाई  से  नारेश्वर

नर्मदाजी – नील कंठ महादेव – भरूच , जानोर, नारेश्वर

जीवन में पहली बार नर्मदा परिक्रमा का विचार बना और सद्गुरु परम पूज्य बाबाजी की कृपा से वह साकार हुवा |

अमरकंटक से प्रारम्भ कर महाराजपुर, पिपरिया, होशंगाबाद , हरदा, ओम्कारेश्वर , बडवानी, शाहदा, प्रकाशा, राजपीपला ,पानेथा, हंसोट, कतपोर ,और विमलेश्वर से बोट द्वारा मीठीतलाई तक दक्षिण तट की परिक्रमा पूर्ण हुई |

छोटे छोटे गाँव, परिक्रमावासियों के प्रति श्रद्धा, सम्मान व्यक्त करने वाले लोग, देश के विभिन्न स्थानों के अन्य परिक्रमावासी , अनेकों मंदिर , साधू संत , मुस्कुराते हँसते बच्चे – यह सब और सबसे बड़ी बात माँ नर्मदा – बिलकुल शांत कहीं चंचल ,कहीं विशाल , कहीं निर्मल , कहीं कलियुगी पुत्रों की अदूरदर्शिता झेलते हुवे , भिन्न भिन्न रूपों में स्नेहसिक्त सम्मोहित आकर्षित करते हुवे , रेवा का सागर के प्रति समर्पण और सागर का रेवा को अपने में समाहित करता रेवा सागर संगम , जहाँ समय की गति रुकने की प्रतीति – जीवन का ऐसा अद्भुत अविस्मरणीय अनुभव |

रेवा सागर संगम – रेवा का अंतिम पड़ाव नहीं है , जन्म से अपने नियंता के मिलन तक जीवन से प्राप्त अनुभवों से उत्तर देने की यात्रा का प्रारम्भ है | अनुभव और आनंद की प्राप्ति में एक ही बात चुभती रही – यह बहुत पहले कर लेना था |

अब उत्तर तट की यात्रा प्रारंभ होती है

मीठीतलाई से 60 किमी दूर भरूच के लिए प्रस्थान किया | रास्ता बहुत अच्छा है | रास्ते  में शुद्ध शाकाहारी होटल वैभव में भोजन किया | वहां और भी सहयात्री  मिले | 5.15 बजे भरूच पहुँच कर नीलकंठ महादेव का दर्शन किया |

नीलकंठेश्वर महादेव

नर्मदा जी के किनारे पर ही बहुत बड़े परिसर में मंदिर है | यहाँ भी 100 सीढियों के बाद घाट है , नर्मदाजी का पाट बहुत बड़ा है ,प्रवाह शांत | घाट के बाद भी कीचड़ से बचने के लिए रखी बोरियों पर कुछ दूर चलने के बाद ही जल मिलता है | नर्मदा जी में जल बहुत कम होने के कारण घाट या पास में स्नान संभव नहीं था | अतः दर्शन नमन किया |

शुक्लतीर्थ

नीलकंठ महादेव मंदिर से 15  किमी पर  शुक्ल तीर्थ है , छोटा सा गाँव लेकिन यहाँ बहुत से मंदिर और उनसे जुडी हुई कथाएं | प्रधान मंदिर शुक्ल नारायण मंदिर है | पटेश्वर और  सोमेश्वर लिंग स्थपित हैं | नारायण की चतुर्भुज मूर्ति के दोनों ओर ब्रम्हा और शंकर जी की मुर्तियां हैं | मंदिर में ही ब्रम्हा विष्णु महेश के  तीन मंदिर और तीनो के नाम में महादेव |

जानोर

शुक्ल तीर्थ से  नारेश्वर के मार्ग पर जानोर है | यहाँ दत्तात्रेय जी का मंदिर है और  ऊंचाई पर  धर्मराज युधिस्ठिर द्वारा बनाया गया छोटा सा धर्मेश्वर मंदिर , पांडवों की गुफा भी है ,हमने दर्शन किये | सीढ़ियों से  बहुत नीचे उतर कर जानोर में भी नर्मदाजी का दर्शन नमन किये | यहाँ पर भी बच्चे मिले | प्रसन्न , मुस्कुराते हुवे |

जानोर

नारेश्वर

जानोर से पालेज होते हुवे (अच्छे रास्ते से ) 40 किमी पर नारेश्वर धाम है | संध्या 6.30 पर नारेश्वर धाम पहुच गए | यहाँ स्वामी रंग अवधूतजी का आश्रम है , बहुत बड़े परिसर में फैला हुवा है | परिक्रमावासियों को निशुल्क आवास और भोजन की व्यवस्था है | कमोड युक्त कमरे हैं | व्यवस्थापक ने कहा कि  परिक्रमावासियों के लिए गद्दे और पलंग नहीं बल्कि निशुल्क  चटाई की व्यवस्था है | बात तो सही थी | परिक्रमावासियों को सारे सुख सुविधाओं में  से कुछ तो त्याग करना ही चाहिए | लेकिन उम्र और शरीर की अपनी आदतें सीमाएं , क्षमताएं हैं, घर से बाहर  उन्हें नकार देने से शारीरिक समस्याओं को भी निमन्त्रण देना ठीक नहीं है | पास ही वैकल्पिक व्यवस्था श्री रंग आशीष आवास थी  जहाँ 500 रुपये रूम पेमेंट बेसिस पर रात्रि विश्राम के लिए कमरा लिया | नारेश्वर छोटा गाँव है , 2 – 3 भोजनालय हैं |  अन्नपूर्णा रेस्टारेंट में भोजन किया |

आज हंसोट (5.00 बजे ) नारेश्वर  (6.30 संध्या) – लगभग 266 किमी, वाया कतपोर , विमलेश्वर ,बोट से मीठीतलाई तक, (दक्षिण तट यात्रा पूर्ण) उत्तर तट यात्रा प्रारम्भ – भडोच , शुक्ल तीर्थ, जानोर पालेज – नारेश्वर      रास्ता: अच्छा है जलपान : हंसोट दोपहर भोजन : भड़ोच मार्ग में होटल वैभव,  रात्रि विश्राम : श्री रंग आशीष आवास नारेश्वर  , भोजन : अन्नपूर्णा रेस्टारेंट

विशेष : क्रॉनिकल 13 ,दसवें दिन का विवरण दिनांक 3.8.19 को देखिये

Chronicle – 11 Narmada parikrama

account – day 9 , 25.2.18 रविवार

हंसोट / विमलेश्वर से मीठीतलाई (रेवा संगम)

हंसोट गेस्ट हाउस में जलपान की व्यवस्था कर दी गई थी | कतपोर से विमलेश्वर 6 किमी है, बीच में कोटेश्वर महादेव के  दर्शन किये और विमलेश्वर 6 बजे पहुंच  गए | विमलेश्वर के  मंदिर में ही , माँ नर्मदा जी (जल) की पूजा , आरती व  प्रसाद  वितरण किया | मंदिर की आरती का भी आनन्द लिया |

बताते हैं की विमलेश्वर में इंद्र, , रीश्यभ्रिंग , सूर्य, ब्रम्हा, शिव जी ने तप किया था |

रात्रि को जो बहुत यात्री आये थे, लोगों ने यहां और ईश्वर भाई के यहाँ विश्राम किया | सुबह रामजी भाई (9723752855), ईश्वर भाई ( 9662601816) भी उपस्थित थे | मंदिर में जहाँ यात्री एकत्र हुए थे ,वहां से लगभग 3 – 4 किमी दूर पर बोट के लिए जाना था | छोटी छोटी बालिकाएं समुद्र की यात्रा की मंगल कामनाओं के साथ  सिर पर जल का कलश लेकर खड़ी थीं |

यात्रा की मंगल कामना

 आगे सड़क बनाने के लिए गिट्टी और गिट्टी के ढेर पड़े थे | वाहन इसके आगे नहीं जा सकते थे  | ऐसा बताया गया कि कुछ समय पूर्व कांग्रेस के एक  नेता की नर्मदा की पद यात्रा  के  दौरान गिट्टी बिछाई  गयी थी , अन्यथा लगभग कीचड़ ही रहता है | वहां से सभी यात्रियों को  लगभग 2 किमी, जहाँ  बोट खड़ी रहती हैं , तक पैदल ही जाना था |

7 बजे पैदल ही प्रस्थान हुवा | समुद्र या नदी के किनारे जैसे बोट खड़ी रहती हैं , घाट बने रहते हैं ,वैसी कल्पना के विपरीत , ज़मीन से लगभग 10 फुट नीचे नहर नुमा नाली , कीचड़, में 9 – 10 बोट खड़ी थीं | बताया गया कि जब यहाँ पानी आ जायेगा तो बोट चलेंगी |

कुछ पुरुष महिलाओं ,वृद्धों को गिट्टी  और कहीं कीचड़ पर ,नंगे पांव और बिना चप्पल जूते देख कर लगता था की पैदल चलना भी इनको ज़रा भी कठिन नहीं लग रहा है  | दर्द थकान परेशानी का कोई भी संकेत इनके चेहरों पर नहीं दिखता  , बल्कि  नर्मदाजी का समुद्र मिलन देखने की उत्कंठा और उत्साह है | मन में ही आवाज़ आयी (बिना श्रद्धा  के नाथ हजारों  मैंने अर्ध्य चढ़ाये हैं , दिखा दिखा कर इस दुनिया को धर्मी भी कहलाये हैं, ) श्रद्धा तो इनकी है, हम लोगों का तो मात्र दिखावा है |

यात्रा में जितना अधिक कष्ट और असुविधा , उतना ही आगे बढ़ने का उल्लास ,शक्ति और  आनंद | ऐसी यात्राओं का अपना अलग ही आनन्द है ,वह आनंद सुविधा जनक घरो में तो कदापि भी नहीं मिल सकता | यह अनुभव मेरी पूर्व की, अमरनाथ, , तुंगनाथ, मुक्ति नारायण ,की सपत्नीक यात्रायें और  पूज्य बाबाजी के साथ मणिमहेश और मानसरोवर की यात्राओं में भी हुवा है |

बोट चलने की प्रतीक्षा करते हुवे ,  लगभग 400 से अधिक  यात्री  भजन कीर्तन ,बातचीत , आपस में परिचय करते रहे | महाराष्ट्र से सबसे अधिक , फिर गुजरात , मध्य प्रदेश व कम संख्या में अन्य प्रदेशों के , साधारण से लेकर  उच्च वर्ग तक सभी तरह के यात्री थे , साधू संत भी थे | मुंबई के आतुरालय सेवा संस्थान से जुड़े हुवे आष्टीकर व उनके परिवार के सदस्य थे जिन्होंने ओंकारेश्वर से परिक्रमा प्रारंभ की थी | अन्य महिलाये पुरुष भी काफ़ी संख्या में थे |

लगभग 2 घंटों के बाद वहां पानी आ गया तब रामजी भाई ने बोट में यात्रियों को बैठने के लिए कहा | 8 -10  फीट नीचे बोट तक जाने के लिए , बांस के टुकड़ों और घास  से पुल नुमा रास्ता बना दिया गया था | एक के बाद एक यात्री , बांस के पुल पर से कीचड़ में गिरते पड़ते ,बोट में बैठने लगे |

बोट में बैठने के लिए बांस के टुकड़ों से बना रास्ता

एक एक  बोट में 40 से लेकर 68 यात्री बिठाये गये | लाइफ जेकेट या सुरक्षा  की कोई व्यवस्था नहीं थी | लेकिन किसी के चेहरे पर कोई भय, शिकायत का भाव नहीं | एक बोट में हरदा के 26 ,और  सनावद के 10 एवं अन्य परिक्रमावासीयों के साथ हम दोनों भी  बैठे  | 9 से 10 बोट चलती हैं और रोज़ लगभग 400 से 500 यात्री हो जाते हैं |  

नर्मदे हर , बोट रवाना

जिन यात्रियों के अपने वाहन थे , उन वाहनों को रामजी भाई , ईश्वर भाई ने व्यवस्था कर विमलेश्वर से मीठीतलाई भेज दिया | मीठितलाई में वे वाहन मिल जायेंगे | हमारे वाहन को मीठितलाई तक ले जाने के लिए रामजी भाई ने   लोकनाथ के साथ एक व्यक्ति की व्यवस्था कर दी |

मीठीतलाई

लगभग 10 बजे बोटों को एक के  बाद एक रवाना किया गया | थोड़ी देर बाद किनारे ओझल हो गए और केवल जल ही जल और आगे पीछे बोट | नर्मदे हर का लगातार उद्घोष पुरुषों द्वारा तो महिलाओं की  भजन कीर्तन में निरंतरता देखने लायक थी |  साढ़े तीन घंटो के बाद मीठितलाई पहुँचे | धूप तेज हो गयी थी | मीठितलाई के लगभग आधे  घंटे पूर्व  बोट वालों ने  नर्मदा जी का समुद्र में संगम स्थल बताया | बोट वहां रोक दी गयी | अमरकंटक में पतली धारा जैसा बाल  रूप  और यहाँ बहुत विशाल भव्य रूप | सचमुच नर्मदाजी समुद्र में समाहित हो गयी | दर्शन कर धन्य ,कृतार्थ हुये  | पूज्य बाबाजी की कृपा आशीर्वाद का ध्यान आया ,उसके बिना यह कैसे संभव था,  और आँखे नम हो गयी | कुछ क्षण आँखे बंद कर , माँ को नमन करते हुवे –  बाबाजी , परिवार के  दिवंगत और वर्तमान सभी सदस्यों  को याद किया कि वे भी इस समय दर्शन नमन कर रहे हैं | बाबाजी को पुनः प्रणाम किया |

बोट के सहयात्री भी हाथ जोडकर नमन कर रहे थे | संगम के जल को सभी ने  मस्तक पर चढ़ाया , आचमन किया, पूजा की | साथ में लाये हुवे कुछ जल को यहाँ अर्पण  किया  और संगम  का जल लिया | सभी ने माँ को नमन किया पूजा की  आरती व प्रसाद वितरण किया | नर्मदा मैया की जय, नर्मदे हर ,नर्मदे हर का उद्घोष होता रहा | बहुत अच्छा लगा | माँ से प्रार्थना की कि दुबारा भी यह अवसर देवें | उस  क्षण की स्मृति से आज भी तन मन रोमांचित हो जाता है | आज भी प्रार्थना है कि माँ फिर से यह अवसर देना |

जहाँ अस्तित्व शेष न हो, मिलन हो, संगम हो ,समर्पण हो, दो मिलकर  एक हो जाएँ ,  वहां परम आनंद और शांति  के  अतिरिक्त हो भी क्या सकता है ? शांत समुद्र , दोपहर 1.30 बजे तेज़ धूप अपने आप शीतल हो गई , नर्मदे हर नर्मदे हर के उद्घोष को अपनी मस्ती में समेटे बहती शीतल बयार , ह्रदय में गूंजता हुवा मिलन संगीत  और उस मिलन समर्पण के प्रत्यक्ष साक्षी हम – अविस्मरणीय क्षण – न जाने कहाँ खो गए –  आनंद और सौभाग्य और किसे कहते हैं ?

और बोट जब फिर से  चलने लगी तब अपने आपे में आये | सब लोग कहने लगे – रुको  रुको ,थोड़ी देर और रुको | लेकिन क्या ऐसे पल रुकते हैं ? बोट आगे बढ़ चुकी थी |

फिर मिठीतलाई पर जहाँ बोटों को रोका गया , वहां घुटने तक कीचड़ था | कुछ बोट जो पहले रुक गयी थीं वहां कमर तक कीचड़ था | बोट से बंधे हुवे एक टायर और बोट वाले का सहारा ले कर उतरा गया  | रोज़ लगभग 400 – 500  परिक्रमावासी यात्री आते हैं , बोट पर चढ़ने  और उतरने की शासन उचित व्यवस्था क्यों नहीं करता | वृद्ध और महिलाओं के लिए बहुत असुविधा जनक था | उतरने के बाद भी कीचड़ और पानी में ही 150 – 200 फ़ुट पैदल चलना पड़ता है |

घुटने , कमर तक पानी में उतरते हुए

वहां अपने अपने वाहन , बस आदि  मिल जाते हैं | जागेश्वर ग्राम वहीँ एक आश्रम ,कुंवा हाथ पैर धोने की व्यवस्था थी |  

दक्षिण तट की परिक्रमा पूर्ण हुई |

विशेष: क्रानिकल 12 उत्तर तट की परिक्रमा के लिए दिनांक 3.8.19 को इसी स्थान पर देखिये

Chronicle – 10 Narmada Parikrma

account – day 8 , 24.2.18 शनिवार

पानेथा आश्रम से हंसोट , विमलेश्वर

पानेथा में प्रातः माँ नर्मदाजी का दर्शन, फिर आश्रम में ही पूजन किया |

नर्मदाजी का इस दक्षिण तट यात्रा का अंतिम गाँव विमलेश्वर है, दक्षिण तट की परिक्रमा  वहां पूर्ण हो जाती है | विमलेश्वर के आगे यदि वाहन से यात्रा की जाये तो नर्मदाजी को लांघना  पड़ता है, इसलिए वहां वाहन से यात्रा नहीं की जाती | वाहनों को विमलेश्वर में छोड़ना पडता है | वाहनों को मीठी तलाई भेजने की व्यवस्था हो जाती है | पदयात्री और वाहन वाले सभी परिक्रमावासी ,विमलेश्वर से मीठी तलाइ  (नर्मदा जी का सागर में संगम- रेवा सागर ) तक बोट से ही  सागर की यात्रा करते हैं | अरब सागर (रेवा सागर) में संगम का दर्शन होता है, बोट रोकी जाती है ,पूजा की जाती है |

अभी तक यात्रियों से व अन्य जानकारियों के अनुसार “ विमलेश्वर में रात्रि विश्राम के बाद , सुबह बोट की यात्रा शुरू होती है , विमलेश्वर में एक मन्दिर है, उसी परिसर में सभी यात्री रात्रि विश्राम करते हैं, कामन लेट्रिन बाथरूम है, पानी और सफाई की व्यवस्था तो है , किन्तु कभी भीड़ अधिक होने से गन्दगी और असुविधा की समस्या आ जाती है “ | इस असुविधा के कारण हमने विचार किया था की विमलेश्वर से अंकलेश्वर लगभग 40 किमी है , रात्रि अंकलेश्वर रुक कर सुबह जल्दी विमलेश्वर चले जायेंगे |

विमलेश्वर मंदिर परिसर व यात्रियों की विश्राम व्यवस्था

पनेथा आश्रम में  जलपान के बाद ,प्रस्थान करने के पूर्व  सरपंच सतीश भाई  (लाला भाई , जबलपुर वाले ) आ गए थे |  न तो उनसे हमारा कोई विशेष परिचय था , ना ही हमारे वहां आने की कोई सुचना उन्हें दी गई थी  | उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं था किन्तु उनकी इच्छा हुई थी की आश्रम जाना है और वे आ गए | सतीश भाई ने हमें बताया कि रात्रि विश्राम के लिए अंकलेश्वर जाने की आवश्यकता नहीं है | विमलेश्वर के 15 किमी पहले हंसोट में , पूज्य बाबाजी के शिष्य जबलपुर निवासी गुरु भाई श्री शंकरलाल जी खत्री के पुत्र चेतन भाई की फेक्ट्री  है, और वहां गेस्ट हॉउस में पूरी व्यवस्था हो जाएगी |

पानेथा आश्रम

अमरकंटक  आश्रम से चेतन भाई को सुचना भी दे दी गई थी  | विमलेश्वर पहुँचने के पूर्व ही , चेतन भाई का फोन आ गया कि गेस्ट हॉउस में सब व्यवस्था हो गई है, हमें कहीं अन्यत्र नहीं जाना है | बिना किसी पूर्व तैयारी  के बावजूद व्यवस्था के किस प्रकार संयोग बनते हैं , माँ और बाबाजी की कृपा का हमें अनुभव हुवा |

गुमान देव – हनुमान जी

पानेथा से 10.30 बजे रवाना होकर उमल्ला होते हुवे अंकलेश्वर और वहां से  गुमान देव पहुँचे | यहाँ हनुमानजी का बहुत प्रसिध्ह और बहुत बड़ा मंदिर है | बहुत दर्शनार्थी थे | सिन्दूर की जगह यहाँ हनुमान जी के मुख पर चांदी थी | दर्शन के बाद , बलबला कुंड भी गए | जल का बहुत बड़ा कुंड है जिसमे बुलबुले निकते रहते हैं | जल गर्म नहीं है, सल्फर के कारण बुलबुले निकलते हैं |

उमल्ला से हंसोट लगभग 55 किमी है | फेक्टरी के गेस्ट हॉउस में भोजन कर बोट की व्यवस्था समझने  के लिए विमलेश्वर रवाना हुवे | हंसोट से कतपोर और वहां से 6 किमी विमलेश्वर है | कतपोर में कोटेश्वर महादेव का मंदिर है |

कोटेश्वर mahadev

विमलेश्वर में मंदिर है | साथ ही  बड़े परिसर में  टिन शेड बना हुवा है | यात्रियों के विश्राम करने की सुविधा हेतु दरी , चटाई है | पास ही कामन लेट्रिन बाथरूम है | अधिकतर यात्री यहाँ रात्रि विश्राम करते हैं | कतपोर ग्राम में वहां के निवासी  ईश्वर भाई पटेल (9723752855) ने पेमेंट बेसिस पर अपने निवास में भी यात्रियों की कुछ बेहतर व्यवस्था कर रखी है |

विमलेश्वर मंदिर परिसर के बाहर ही एक छोटी से दुकान है | वहां रामजी  भाई (9662601816), प्रति यात्री 150 रुपये के हिसाब से बोट की बुकिंग करते हैं |  हमारी  बुकिंग के बाद , हमसे सुबह 6 बजे आने के लिए कहा |

 बुकिंग के बाद  हम हंसोट लौट गए और स्थानीय मंदिर,बिल्वेश्वर महादेव, सूर्य कुंड, और तिलेश्वर महादेव  के  दर्शन किये | कहते हैं यहाँ महर्षि जाबाली ने तप किया था |

सूर्य कुंड

चेतन भाई की फैक्ट्री बहुत बड़ी है,प्लाईवुड बनता है , आटोमेटिक मशीने हैं, विदेशों तक माल भेजा जाता है | पूज्य बाबाजी ने ही फैक्ट्री का उद्घाटन किया था |  परिसर बहुत बड़ा है,गौशाला भी है , सेंकडों कर्मचारियों की भोजन व्यवस्था भी परिसर में ही है | चेतन भाई की अनुपस्थिति में भी वहां के स्टाफ ने हमारी पूरी व्यवस्था कर दी थी | चेतन भाई और उनके स्टाफ को धन्यवाद |फेक्टरी परिसर में आज संध्या सुंदर कांड का पाठ भी आयोजित था | हम भी कुछ समय के लिए पाठ में रहे | रात्रि विश्राम किया |

आज पानेथा (10.30 ) हंसोट (6.30 संध्या) – लगभग 150  किमी, वाया  उमल्ला, गुमानदेव ,बलबला कुंड, हंसोट , कतपोर, विमलेश्वर,       रास्ता: अच्छा है दोपहर , रात्रि भोजन व् विश्राम : गेस्ट हॉउस हंसोट डीज़ल : हंसोट  

विशेष : नवमे दिन का विवरण 3.8.19 को देखिये

Chronicle – 9 Narmada Parikrama

account – day 7 , 23.2.18 शुक्रवार

शाहदा से पानेथा आश्रम

प्रकाशा में श्री दगडू महाराज सत्संग भवन , नर्मदाजी ( जल का ) पूजन

शाहदा से 9.30 बजे प्रस्थान कर 15  किमी दूर प्रकाशा पहुँचे |हाराष्ट्र के नंदुरबार जिले की शाहदा तहसील प्रकाशा गाँव ,तापी नदी के किनारे बसा है |इसे दक्षिण काशी भी कहा जाता है |

गंधर्वराज पुष्पदंत को  बिना अनुमति के बगीचे से शिव पूजा के लिए पुष्प तोड़ने के अपराध के कारण राजा ने कारावास का दंड दिया | कारावास में ही अत्यंत दीन हीन विवश होकर  भगवान आशुतोष को प्रसन्न करने के लिए   शिव लिंग की स्थापना कर गन्धर्वराज पुष्प दन्त ने एक  स्तोत्र  रचा | भगवान शिव प्रसन्न  हुवे | वही स्तोत्र शिव महिम्न स्तोत्र के नाम से जाना जाता है | पूरे भारत में पुष्प दंतेश्वर का एक ही मंदिर है जो प्रकाशा में है |

पुष्प दंतेश्वर मंदिर

प्रकाशा में केदारेश्वर ,दक्षिण काशी  के मंदिर भी हैं | संत श्री दगडू महाराज जी सत्संग भवन है जहाँ ,अखंड राम धुन ,भजन चल रहे हैं | पूजा  स्थल सभी एक ही विशाल परिसर में हैं | वहीँ माँ नर्मदाजी ( जल ) का पूजन, आरती प्रसाद वितरण किया |

पास में ही माँ  अन्नपूर्णा जी का मंदिर का भी दर्शन किया | भगवान् शिव और माँ अन्नपूर्णा के  बहुत ही  सुंदर विग्रह हैं |

माता अन्नपूर्णा मंदिर

तलोदा, अक्कलकुवा , सागबारा होते हुवे , प्रकाशा से  लगभग 100 किमी दूर डोडियापारा, और वहां से रोड से 10 किमी अंदर देव मोगरा 1.45  बजे पहुँचे | यहाँ  पांडवों की माता कुंती का एकमात्र मंदिर है | शिवरात्रि के समय यहाँ मेला लगता है | अभी भी काफ़ी भीड़ थी | यहाँ देवी को धान चढ़ाया जाता है  और प्रसाद में वापिस धान ही दिया जाता है | यहाँ का धान कभी समाप्त नहीं होता , ऐसी मान्यता है |

कुंती माता का मंदिर – देव मोगरा

देव मोगरा दर्शन के बाद वापिस डोडियापारा से अंकलेश्वर रोड पर 4 किमी पर शिवम पार्क शाकाहारी होटल में भोजन के बाद , डोडियापारा से 46 किमी राज पीपला और वहां से  लगभग 40 किमी शूल पाणेश्वर  के लिए प्रस्थान किया |

देव मोगरा

 शूल पाणेश्वर की झाडी और पुराना मंदिर सरदार  सरोवर बाँध में डूब गए | बांध नर्मदा तट पर ही है, वहीँ से माँ नर्मदा का दर्शन नमन किया | शूल पाणेश्वर  का नया मंदिर बना है | पूज्य बाबाजी के शिष्य त्रिवेदीजी वहां पूजा इत्यादि व्यवस्था देखते हैं |

शूल पाणेश्वर नया मंदिर

फिर वहां से राज पीपला में, हरसिद्धि माता, कुम्भेश्वर महादेव ,शनि मंदिर, छोटी मोटी पनावटी मंदिर में दर्शन किये | करीब 15 किमी पर पोइचा में  स्वामी नारायण का मंदिर भी है , बहुत बड़ा परिसर और भव्य मंदिर दर्शनीय है | पूरा देखने के लिए कम से कम 4 घंटे का समय चाहिए था | हमें आज पानेथा आश्रम पहुँचना था, इसलिए वहां से रवाना हो गए |

पानेथा के लिए राजपीपला से उमल्ला 25 किमी और उमल्ला से 15 किमी अंदर नर्मदाजी के तट पर पानेथा में पूज्य बाबाजी का  “ मैकल सुता कल्याण आश्रम “ है | ह्र्य्दियेश मुनि जी वहां की व्यवस्था देखते हैं | उन्हें  सुचना मिल गई  थी | अँधेरा हो गया था , हम सुगमता से  आश्रम तक पहुँच सकें  इसलिए  ह्र्य्दियेश मुनि जी ने एक प्रतिनिधि भेज दिया था | रात्रि 9.15  बजे आश्रम पहुँचे | आश्रम में भोजन और रात्रि विश्राम किया | सारी व्यवस्था कर दी गई थी |

प्रातः देखा कि नर्मदा जी के तट पर ही ,लगभग 12 एकड़ में केले और गेहूं की खेती भी है | आश्रम में  मंदिर और कई कमरे हैं , गौशाला भी है | सुन्दर वातावरण प्रदुषण मुक्त है | बहुत अच्छा लगा | नर्मदा जी को प्रणाम किया | आश्रम में पूजन किया | वाहन से परिक्रमा करने वाले प्रायः पानेथा आश्रम नहीं जाते  |

आज शाहदा (9 बजे) से पानेथा – (रात्रि 9 बजे) लगभग 290 किमी, वाया प्रकाशा तलोदा, अक्कलकुवा साग्वारा, देव मोगरा, दोदियापारा, राजपिपला, शूल पाणेश्वर     रास्ता: अच्छा है जलपान :प्रकाशा, दोपहर भोजन : शिव पार्क होटल (अंकलेश्वर रोड)  रात्रि भोजन व विश्राम : मैकल सुता कल्याण आश्रम -पानेथा आश्रम . डीज़ल – राजपिपला      

विशेष: आठवें दिन का विवरण 2 .8.19 को देखिये

Chronicle – 8 Narmada Parikrama

account – day 6

नर्मदा परिक्रमा छठवां दिन – 22.2.18 गुरुवार : बडवानी से शाहदा

सप्त श्रृंगी देवी मंदिर शाहदा में नर्मदाजी ( जल का ) पूजन

सुबह बडवानी से 9 बजे प्रस्थान किया | 8 किमी पर जैन तीर्थ बावनगजा में रुक कर दिगम्बर भगवान आदिनाथ की 84 फीट ऊँची प्रतिमा का दर्शन नमन किया | काफ़ी विशाल परिसर है, रहने के लिए सुविधा जनक कमरे ,भोजनशाला सभी कुछ है | अग्रिम सुचना पर कमरों की बुकिंग हो जाती है |

जैन तीर्थ बावनगजा का विशाल परिसर

इसे सिद्ध क्षेत्र  चूलगिरि भी कहा जाता है | 850 सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद चूलगिरी सिद्ध पर्वत के दर्शन होते हैं  | बताया गया कि वहां रावण का भाई कुंभकर्ण और पुत्र इन्द्रजीत ने तपस्या की थी | कुंभकर्ण के पद चिन्ह भी हैं | हम ऊपर तो नहीं गए | लगभग डेढ़ घंटे तक परिसर में ही रहे ,वहीँ कैंटीन में जलपान किया  |

शाहदा के लिए (वाया पाटी सिलावाद निवाली, खेतिया ) प्रस्थान किया | बडवानी से लगभग 110 किमी के बाद दोपहर को खेतिया पहुँचे |

तोरनमाल – महाराष्ट्र का एक हिल स्टेशन
वहां जानकारी मिली कि खेतिया से 30 किमी पर महाराष्ट्र का हिल स्टेशन है – तोरंणमाल | वैसे तोरनमाल नर्मदाजी की परिक्रमा में नहीं है , किन्तु हमने विचार किया कि महाराष्ट्र का हिल स्टेशन है , एक रात्रि यहाँ रुक सकते हैं |

तोरनमाल जाने के रास्ते में दोनों ओर सूखा था ,कोई हरयाली नहीं थी | मिटटी के पहाड़ थे , दर्शनीय जैसा कुछ भी नहीं था | तोरनमाल में आज बाज़ार था  | वन विभाग के गेस्ट  हाउस बने हैं , अभ्यारण्य भी है | हमने नीचे ही वन विभाग से कमरा बुक करवा लिया था , किन्तु ऊपर पहुँचने के बाद  एक रात रुका जाये ऐसा कुछ लगा नहीं | गर्मी भी थी | केवल एक बड़ी झील है – यशवंत झील | बाज़ार होने के कारण अस्थाई दुकाने लगी थी , केवल शाकाहारी भोजन की भी कुछ ठीक व्यवस्था नहीं थी | जो भी रेस्टारेंट थे उनको देखकर कुछ भी खाने का मन नहीं हुवा | यहाँ उल्लेखनीय है कि 1 बजे , खेतिया में , गुरुकृपा शुद्ध शाकाहारी भोजनालय में भोजन तैयार था ,फिर भी वहां भोजन  नहीं किया | कहते हैं परोसी हुई थाली छोड़ना नहीं चाहिए और जहाँ भोजन मिलता है  भगवान का प्रसाद समझ कर अवश्य कर लेना चाहिए | अंततः आज दोपहर का भोजन नहीं हुवा |

तोरणदेवी का एक छोटा सा मंदिर काफ़ी ऊंचाई पर था | वहां गाड़ी नहीं जाती | तोरनमाल में गुरु गोरखनाथजी ने तपस्या की थी | उनके मंदिर में दर्शन किये | वहां के महात्माजी पूज्य बाबाजी को अच्छी तरह जानते हैं और उनका सन्मान करते हैं | उन्होंने रुकने व भोजन के लिए कहा , किन्तु हम नहीं रुके |   तोरनमाल से खेतिया वापसी मार्ग पर 3 किमी पर गुरु गोरखनाथ जी के गुरु मत्स्येन्द्रनाथ जी के मंदिर है | वहां  दर्शन कर ले, इस विचार से आगे बढे |  | रास्ता बहुत ख़राब था , टायर पंचर हो गया था | ठीक करने की कोई व्यवस्था भी नहीं थी | मत्स्येन्द्रनाथ जी के  मंदिर दर्शन नहीं कर सके | क्षमा मांगते हुवे  वहीँ से नमन किया |

तोरनमाल से शाहदा 50 किमी  है , खेतिया तक नहीं जाना पड़ता, पहले ही रास्ता कट जाता है | वहां रास्ते में  गन्ने के रस के लिए रुके | ठेले वाले को 3 गिलास गन्नें के रस का जब पैसे देने लगे तो उसने बताया कि पास खड़े एक युवक ने पैसे दे दिये हैं | वह युवक बिलकुल नहीं माना , कहा कि आप लोग परिक्रमा वासी हैं , हमारा अधिकार बनता है | परिक्रमावासीयों के प्रति  ऐसा प्रेम , आदर . आग्रह कई जगह  अनुभव हुवा |

शाहदा में मध्यम श्रेणी का शाकाहारी होटल जैन प्लाजा के  सामने ही गणपति टायर्स से नया  टायर बदलवाया | वहीँ पर इनकी भी नई होटल है | सामने ही सप्त श्रृंगी देवी का बड़ा मंदिर है | उसी मंदिर में साथ में लाये नर्मदाजी के जल का  पूजा नमन ,प्रसाद वितरण किया | रात्रि विश्राम जैन प्लाजा में किया | महाराष्ट्र से एक बस में परिक्रमावासी थे , वे भी वहीं रुके थे , भोजन की व्यवस्था उनकी स्वयं की थी | भोजन के बाद उन लोगों  ने सामूहिक भजन भी किया |

आज बडवानी( 9 बजे) से  शाहदा (4 बजे). लगभग 215 किमी, वाया  बावनगजा पाटी,  सिलावाद ,खेतिया (खेतिया से तोरनमाल का रास्ता ठीक नहीं) जलपान : बावनगजा   रात्रि भोजन व विश्राम : जैन प्लाजा , शाहदा डीज़ल : बड़वानी

विशेष : सातवें दिन का विवरण 26.7.19 को देखिये

Chronicle – 7 Narmada Parikrma

account – day 5

नर्मदा परिक्रमा – पांचवां दिन – 21 फरवरी 18 बुधवार : ममलेश्वर से बडवानी नर्मदा जी : ब्रम्हपुरी घाट  दर्शन , ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग दर्शन पूजन , गोमुख : दर्शन , ग्राम तेली भटयन में पुनः दर्शन, बडवानी : स्नान,

आज सुबह ब्रम्हपुरी घाट पर पुनः नर्मदा माँ का दर्शन नमन किया  | पश्चात ममलेश्वर मंदिर के गर्भगृह में पंडित सुधिर अत्रे जी  ने ज्योतिर्लिंग का शांति के साथ विधि पूर्वक रुद्राभिषेक कराया | खूब आनंद आया | जैसे ही पूजा के पश्चात पंडितजी प्रसाद दे रहे थे , मन में आया की स्वयं बाबाजी प्रसाद दे रहे हैं, प्रसाद हाथ में ही था कि बाबाजी का फोन आया – पूछा- सारडा जी कहाँ हो- “ मैंने उत्तर दिया – बाबाजी ममलेश्वर मंदिर में रुद्राभिषेक  के बाद आप ही तो आशीर्वाद और प्रसाद देरहे हैं “ फिर  बाबाजी की चिर परिचित हंसी | ऐसी  कृपा है बाबाजी की | सर्वज्ञ और सर्वत्र हैं बाबाजी | फिर पूछा यात्रा कैसी चल रही है ? मैंने उत्तर दिया – बहुत अच्छा लग रहा है , आपकी कृपा है |

गर्भगृह में रुद्राभिषेक

रुद्राभिषेक के बाद गोमुख पहुँच कर वहां माँ का पूजन किया | प्रसाद ,दक्षिणा वितरण किया | नियमानुसार नर्मदाजी का जो जल माई की बगिया से लाये थे , उसमे से थोडा यहाँ गोमुख में अर्पण किया  , और गोमुख से थोडा जल उसी पात्र में फिर भरा |

गोमुख से बाहर आये तो बहुत से बच्चे थे | पुष्पा ने कुछ बच्चों को वस्त्र पहनाये | मैंने कहा – कपड़े दे दो , पहनाना  क्या ज़रूरी है ? उसने जो उत्तर दिया वो आज भी याद है – कहा – “ पहली बार पहनाये तब से ऐसा लग रहा है कि नर्मदाजी के बाल स्वरूप को पहना  रही हूँ  और पहनाना अच्छा लग रहा है | ”  बच्चों को नोटबुक, बिस्किट, चाकलेट भी वितरण किया |

ऐसा नहीं है कि सिर्फ हमने ही बच्चों को कुछ दिया हो, प्रायः सभी परिक्रमावासी बच्चों को वस्त्र, नोटबुक, बिस्किट मिठाई  कुछ न कुछ देते ही हैं, | लेकिन बच्चों में जिसको जो मिला उसकी प्रसन्नता किसी दुसरे से कम नहीं थी | उन की एक फोटो में उन सब की  मुस्कराहट, प्रसन्नता यह संकेत करती है कि जिसको जो मिला उसी में वे खुश हैं , किसी से कोई शिकायत नहीं  | और  एक हम हैं , बहुत कुछ होते हुवे भी , संपन्न होते हुवे भी ईर्ष्या लालच कम नहीं होता | और अधिक मिल जाये , और अधिक जमा कर लें – संग्रह की  प्रवृत्ति कम नहीं होती |

हमसे ज्यादा खुश कौन

फिर  ममलेश्वर में ही , भक्तनिवास के सामने कुबेर भंडारेश्वर , सिद्ध गणेशजी और हनुमान जी के मंदिर में दर्शन नमन किये | भक्तनिवास में ही भोजन कर  लगभग 12 बजे बडवानी के लिए प्रस्थान किया | वाया  सनावद , पिपलगांव, कसरावद ,अंजड – बडवानी की दुरी 170 किमी है |

ग्राम भटियान  तेली

ममलेश्वर से लगभग 50 किमी पिपलगांव आने का बाद , 1.30 बजे मार्ग में एक बड़ा बोर्ड “ सियाराम बाबा की जय “ देखा | रुक कर जानकारी ली | बताया गया कि मुख्य सड़क से 15 किमी अंदर ग्राम भटियान  तेली में नर्मदा जी हैं और वहीँ संत सियाराम बाबा का दर्शन भी हो जायेगा | तब याद आया की कल रात्रि  भक्त निवास में गुजरात से आये एक  परिवार ने कहा थी कि आप कार से  जा रहे हैं तो रास्ते में बाबा सियाराम के दर्शन अवश्य करें | 15  किमी चलने से  पुनः माँ  नर्मदा का  नए रूप में दर्शन नमन करने का सोभाग्य मिला है ,तो अवश्य करेंगे | हम चले गए | शांत , वातावरण, खूब चौड़ा पाट ,एक नाव , गाँव के लोग , माँ को प्रणाम किया | स्थान बड़ा सुंदर मनोरम लगा | नहीं जाते और बाद में  जानकारी मिलती तो अफ़सोस होता | जल में जा कर नमन किया , श्रीफल भेंट किया |

लोगों ने कहा – नर्मदा परिक्रमा पर हैं तो सामने ही बाबा सियाराम जी हैं , दर्शन कर लेवें | सच बात तो ये है कि पूज्य बाबाजी के अतिरिक्त किसी अन्य संत के दर्शन या चरण स्पर्श करूं – ऐसी न तो कभी  इच्छा हुई ,न कभी मन ने आग्रह किया, और न करने का कभी अपराध बोध भी नहीं हुवा, किसी का अनादर करना है ऐसी भावना भी नहीं रही | बस मन नहीं करता था | इसलिए दर्शन की कोई विशेष उत्कंठा न होने पर भी लगा कि संत हैं , आ ही गए तो  दर्शन कर लेने में कोई हर्ज नहीं है |

वहीँ पर तीन मंजिले मकान में , बाबा सियारामजी का आश्रम है | भूतल के कमरे में लगभग 25 महिला पुरुष बच्चे बैठे थे , जिनको एक व्यक्ति दोनों हाथों से प्रसाद बाँट रहा था | हमें बैठने के लिए कुर्सियां दीं | उपर तीसरी मंजिल में बाबा से मिलने गए | लगभग 85 वर्ष के वृद्ध , कमर पूरी झुकी हुई, पुरे शरीर में . पतले  सफ़ेद वस्त्र की सिर्फ एक लंगोट के सिवा कुछ नहीं | हमसे परिचय पूछा , हमारे साथ ही  नीचे आये और हम तीनो को अलग अलग ढेर सारा प्रसाद  जिसमे  मीठा, नमकीन, मूरी इत्यादि थे, दिया | दक्षिणा भेंट कुछ भी लेने से इंकार कर दिया |

फिर एक नया अनुभव हुवा | पूज्य बाबाजी के पास जो भी संत सन्यासी महात्मा आते हैं ,बाबाजी सबको सन्मान स्नेह देते हैं | पर शिष्य सेवक भी वैसा ही करें , ऐसा कुछ नहीं कहते | गृहस्थों में किसी सदस्य को कोई व्यसन है, परिवार के लोग बाबाजी से निवेदन करते हैं कि बाबाजी  उसे समझाइये | बाबाजी किसी से कुछ नहीं कहते , बस इतना ही कहते हैं माँ जब चाहेगी छोड़ देगा | और मैंने इन 30 वर्षों में इस बात को सत्य होते देखा है | गूढ़ बात यह है कि व्यक्ति स्वयम अपने विवेक से समझे करे तभी वह स्थायी होता है | जब बाबाजी की कृपा होती है तो विवेक भी जागृत हो जाता है |

बाबाजी की कृपा बरसती रहे , प्रकाश और दिशाएं अपने आप मिलेंगी |    

ग्राम :  मंडवाडा

तेली भटयान से लौट कर वापिस मुख्य मार्ग पर आ गए | कसरावद से  ठीकरी के रास्ते पर निमरानी ग्राम में इंडस्ट्रियल एरिया है | रास्ता बहुत अच्छा है | ग्राम अंजड पहुँचने के पूर्व ग्राम मंडवाडा  में रास्ते में ही एक भव्य शिव मंदिर देखा, साथ ही पुराना मंदिर भी है | नहाली और कुण्डी नदी का संगम है, परिक्रमावासियों के लिए सदाव्रत की व्यवस्था भी है | नीम , पीपल और बड तीनो पेड़ों का एक साथ संगम भी है | एक सज्जन वहां बैठे थे , बताया की यह ज़मीन उन्ही की है ,निर्माण भी कराया और अब देख रेख करते हैं | उनका व्यवसाय भी है , वहां भी समय देते हैं  

बड़वानी

संध्या 5 बजे बड़वानी पहुँच गए | यहाँ से 4 किमी पर राजघाट है | वहां  नर्मदाजी का पाट बहुत चौड़ा है | जगह जगह  बांध बनने  के कारण जल स्तर तो कम हो गया , परन्तु माँ  के प्रवाह को कौन रोक सका है | सबकी प्यास बुझाती, तृप्त करती , कृपा करती अविरल गतिमान रही है और रहेगी | हंडिया की तरह  यहाँ चट्टानें नहीं थी |

राजघाट , संध्या काल में हम सभी ने  स्नान लाभ लिया, पूजा की , प्रसाद वितरण किया | दीप दान (प्रवाह )भी किया | पंजाब हरियाणा की गाडियों से परिक्रमावासी व संत आये हुवे थे और वे भी  स्नान कर  रहे थे |

आज ममलेश्वर (12 बजे) से बडवानी (5.00 बजे). लगभग200  किमी  वाया सनावद, पिपलगांव, ग्राम भाटियान तेली, कसरावद , मंडवाडा ठीकरी अंजड से बड़वानी ,      रास्ता: अच्छा  जलपान व दोपहर भोजन: भक्त निवास  रात्रि भोजन : सांवरिया ढाबा शुद्ध शाकाहारी बहुत अच्छा रात्रि विश्राम: होटल सत्कार , बडवानी  डीज़ल : बड़वानी

विशेष : छठवें दिन का विवरण 19.7.19 को देखिये

Chronicle – 6 Narmada Parikrama

account – day 4

नर्मदा परिक्रमा – चौथा दिन – 20 फरवरी 2018 मंगलवार

हरदा से अमलेश्वर (ओम्कारेश्वर ) माँ नर्मदा जी : अमलेश्वर / ममलेश्वर – दर्शन

हरदा ( 9 बजे )  से  जलपान के बाद  आशापुर (70 किमी ), फिर खंडवा (40) पहुँचे | खंडवा से 25 किमी पर पंधाना रोड पर ग्राम थारवा में पूज्य बाबाजी द्वारा बनाया गया एक  नव निर्मित आश्रम है | निहालवाड़ी आश्रम के नाम से भी जाना जाता है | पूज्य बाबाजी के शिष्य निरंजनानन्द महाराज जी एवं प्रकाशानान्द महाराजजी वहां रहते हैं | हमने उन्हें पूर्व में ही आश्रम आने की सुचना दे दी थी | आश्रम बहुत ही सुंदर , बड़े बड़े कमरों और सभी सुविधाओं के साथ बना हुवा है | पर्याप्त खेत भी हैं | स्वच्छता, घने पेड़ फुलवारी शांत वातावरण  पूज्य बाबाजी की विशेष रूचि व स्वभाव में  है , इसलिए बाबाजी के सभी आश्रमों में इसका ध्यान रखा जाता है |

भोजन और विश्राम के बाद लगभग 2.30 वहां से प्रस्थान किया | सनावद होते हुवे लगभग 5 बजे अमलेश्वर पहुँचे |नर्मदा  परिक्रमा में ओम्कारेश्वर का बहुत महत्व है | अमलेश्वर और ओम्कारेश्वर दोनों ज्योतिर्लिंग है – लेकिन एक माना  गया है | कहते हैं यहाँ सैंकड़ों तीर्थ हैं |

अमलेश्वर ( ममलेश्वर भी कहते हैं) से  ओम्कारेश्वर जानेके लिए बहुत बड़ा पुल बना हुवा है | यहाँ यह समझना आवश्यक है की माँ नर्मदा के एक ओर , दक्षिण तट पर  ममलेश्वर है ओर दूसरी ओर उत्तर तट पर ओम्कारेश्वर | परिक्रमा पूर्ण होने के पूर्व नर्मदाजी को लांघ नहीं सकते. इसलिए पहले ममलेश्वर में ही स्थित ज्योतिर्लिंग की पूजा , नर्मदाजी को  जल अर्पण किया जाता है व लिया जाता है |

ममलेश्वर में बहुत से आश्रम , गेस्ट हॉउस , होटल इत्यादि हैं | हम भक्त निवास पहुँचे , जो शेगांव के संत (ब्रम्हलीन) पूज्य गजानन महाराज के ट्रस्ट द्वरा संचालित है |  कमरों और डोरमेट्री के  लिए यहाँ एडवांस रिजर्वेशन नहीं होता | उपलब्धता के आधार पर साफ सुथरी सभी सुविधाओं ( जैसे गरम पानी, वेस्टर्न स्टाइल कमोड , गीज़र, रूम कूलर , ऐसी , नान ऐसी, ) इत्यादि के साथ , पहले आओ पहले पाओ , व्यवस्था के  साथ न्यूनतम किराये पर यात्रियों , दर्शनार्थीयों और परिक्रमावासियों को आवास व्यवस्था दी जाती है | बताया गया कि लगभग 300 बेड की व्यवस्था  है | वाहनों के लिए पार्किंग स्थल है | पार्किंग स्थल से कमरे तक सामान ले जाने के लिए ट्राली है | अनेकों पेड़ पोधे, हरियाली है

गजानन महाराज जी , दत्त भगवान , अहिल्या माता का मंदिर है | किस समय क्या कार्यक्रम होता है, आरती, जलपान, भोजन,रेट, समय  की सूची, भोजन शाला में  सेल्फ सर्विस, सारी जानकारियां बोर्ड पर लिखी गई हैं |

शुद्ध स्वादिष्ट नाश्ता आलूपोहा / उपमा / इडली / चाय कॉफ़ी 7 रु में उपलब्ध है | असीमित भोजन गरमा गरम रोटी, दाल, चावल , सब्जी , हलुवा 35 रुपये में उपलब्ध है | सेल्फ सर्विस है , किन्तु थाली गिलास साफ करने की उनकी अपनी व्यवस्था है | यदि कोई परिक्रमावासी रात्रि 10 बजे के बाद भी आता है तो उसे भोजन निशुल्क दिया जाता है | कितना भी आग्रह करो , कोई भी कर्मचारी किसी प्रकार की टिप नहीं लेते | सब कुछ बहुत प्रसंशनीय है | यहाँ पर वाहन और पदयात्रा  करने वाले महाराष्ट्र गुजरात दक्षिण भारत  के कई परिक्रमावासियों से , भेंट हुई | परिक्रमा में सबको आनंद की अनुभूति हुई |  

पुरे भारत में इस  ट्रस्ट द्वारा, शेगांव ,ओम्कारेश्वर , पंढरपुर, आलंदी, और त्र्यम्बकेश्वर धार्मिक स्थलों में यात्रियों के लिए भक्त निवास बनाये गए हैं | ट्रस्ट के कार्यकर्ता जिस तरह अपना  कार्य करते हैं, उस तरह यदि देश के नागरिक  अधिकारी , कर्मचारी कार्य करने लगें तो देश का नक्शा ही बदल जायेगा | भविष्य में संयोग हुवा तो शेगांव की व्यवस्था और आनन्द सागर के नाम से भव्य बगीचा है, दर्शन करने की लालसा है | पुनः – सब कुछ बहुत प्रसंशनीय है |

सबकुछ देख कर हमें अपने अमरकंटक आश्रम की याद आ गयी , जहाँ स्वच्छता और व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जाता है |

भक्तनिवास में कमरे की व्यवस्था करने के बाद , आधा किमी से भी कम दुरी पर संध्या में ही  ब्रम्हपुरी घाट में माँ नर्मदा जी के दर्शन , नमन किया |

ब्रम्हपुरी घाट
माँ नर्मदा – ब्रम्हपुरी घाट

अमरकंटक में ही हमें बता दिया गया था कि ममलेश्वर में रुद्राभिषेक  पूजा इत्यादि की व्यवस्था के लिए मार्कन्डेय उदासीन आश्रम में स्वामी प्रणवानंद जी से निर्देश लेलेवें | वे प्रवास में थे | अतः आश्रम के कोठारीजी ने इस व्यवस्था हेतु  पंडित सुधीर अत्रे जी को कहा | पंडित जी से भेंट हुई | रुद्राभिषेक हेतु तैयार होकर सुबह 9 बजे ममलेश्वर मंदिर में पहुँचने हेतु बताया |

आज हरदा (9.00 सुबह ) ममलेश्वर (संध्या 5.00 बजे). लगभग 210  किमी  वाया आशापुर, खंडवा, ( पंधाना रोड पर थारवा आश्रम / निहाल वाडी आश्रम ) सनावद , रास्ता: अच्छा दोपहर भोजन : थारवा आश्रम ( पंधाना ) रात्रि विश्राम व भोजन : श्री गजानन महाराज शेगांव  ट्रस्ट संचालित भक्तनिवास

विशेष : पांचवे दिन की जानकारी 12 जुलाई को इसी स्थान पर देखिये

Chronicle -5 Narmada Parikrama

account – day 3

नर्मदा परिक्रमा – तीसरा दिन – सोमवार : पिपरिया से हरदा

नर्मदाजी – सांगाखेड़ा :  होशंगाबाद – स्नान, पूजन  , हंडिया में पुनः दर्शन स्नान पूजन , परिक्रमा वासियों के दर्शन

पिपरिया में नर्मदाजी नहीं है. सुबह स्नान के बाद 8.30 बजे होशंगाबाद के लिये प्रस्थान किया |

जानकारी मिली कि पिपरिया से लगभग 35 किमी  पर सेमरी ग्राम से 14 किमी अन्दर सांगाखेड़ा ग्राम है , वहां नर्मदाजी हैं | मन हुवा चलो ,माँ के दर्शन सांगाखेड़ा में भी करेंगे |

वहां छोटे छोटे स्टाल लगे थे | दुकानदार ने कहा – बाबूजी नारियल ले जाइये | पूछा – कितने का ? बताया – बीस रूपये का | मैंने बुद्धिमता पूर्वक कहा – पहले ही मालूम था , महंगे मिलेंगे , इसलिए 25 नारियल थोक भाव में खरीद कर ही रवाना हुए थे | यह सुनकर दुकानदार हँस दिया | उसकी हंसी स्मृति से गई नहीं , कुछ समय बाद परिक्रमा के दौरान ही उसकी हंसी का अर्थ जब समझ में आया तो अपने आप पर क्षोभ हुवा , कसक आज भी है |

हमने दर्शन , आचमन, नमन , किया | जल कम लेकिन  बिलकुल साफ , खूब चौड़ा पाट , सुन्दरता देखते ही बनती थी |

सांगाखेड़ा में दर्शन

वहां बच्चे थे जिन्हें वस्त्र, बिस्किट  दिये | दिया तो बहुत थोड़ा लेकिन बच्चे इतने में ही बहुत खुश प्रसन्न थे | और एक हम हैं , बारीक़ बारीक़ अर्थहीन बचत के लिए प्रयत्न करते रहते हैं , जितना मिलता है , मिलने की प्रसन्नता तो दूर और अधिक  पाने की लालसा बढ़ती जाती है | पुष्पा ने तो बच्चों को ड्रेस पहनाये भी. उसको  बहुत भी प्रसन्नता हो रही थी | बाद में तो सभी जगह  उसने बच्चों को खुद ही ड्रेस पहनाये | बच्चों की ख़ुशी  देखकर सब को बहुत अच्छा लग रहा था | कुछ नया अहसास हो रहा था | माँ की परिक्रमा के पहले इस प्रकार का अहसास कभी नहीं हुवा था |

रास्ते में बबई ग्राम में इन्दोरी होटल में पोहा समोसा जलेबी का जलपान किया ,10.15 बजे प्रस्थान किया | पुरे मार्ग में दोनों तरफ हरियाली  , रास्ता अच्छा , लगभग 12 बजे दोपहर को होशंगाबाद पहुँचे |होशंगाबाद में  नर्मदाजी के  किनारे  कई मंदिर हैं , मुख्य मंदिर हैं- जगन्नाथजी, बलदाउजी , हनुमान जी, रामचन्द्रजी, महादेवजी और शानिदेवजी  |

सेठानी घाट

स्नान के लिए सेठानी घाट पहुँचे . काफी  बड़ा , प्रसिद्द घाट है , साफ सुथरा ,वस्त्र बदलने की व्यवस्था है. अनेकों स्त्री पुरुष स्नान कर रहे थे | सेठानी घाट – नाम के अनुरूप यहाँ जल और प्रवाह में कोई कृपणता नहीं थी | स्नान करने वाले अधिक गहराइ  में न जा सकें इसलिए सुरक्षा के लिए पोल और चैन लगी हुई थी |  सुरक्षित क्षेत्र में ही   माँ की गोद में स्नान , फिर पूजन, प्रसाद व दक्षिणा वितरण किया.

सेठानी घाट

लगभग २ बजे होशंगाबाद से हरदा के लिए प्रस्थान किया . 47 किमी सिवनी मालवा में नए होटल सेलिब्रेशनमें शुद्ध शाकाहारी भोजन किया | भोजन साधारण था , सब्जी और दाल में रंग डालकर आकर्षित करने के प्रयास ने सब्जी दाल का स्वाद बिगाड़ा , और महंगा भी था | फिर 27 किमी पर टिमरनी में गुजरात से वेन में आये परिक्रमा वासियों से भी भेंट हुई. लगभग 5 बजे हरदा पहुँचे | हरदा से 20 किमी पर हंडिया जाकर नर्मदा जी का पुनः दर्शन ,नमन किया | जल राशी बहुत ही कम थी , चट्टानें बहुत ज्यादा थी |

नर्मदा परिक्रमा में हंडिया का विशेष महत्व है | यहाँ रिद्धनाथ जी का जीर्ण शीर्ण मंदिर है | कहा जाता है यहाँ कुबेर जी ने तप किया था |

रिद्धनाथ मंदिर हंडिया

बहुत बड़ा पुल भी  है जो हंडिया के दूसरी ओर नेमावर को  जाता है |  परिक्रमा में लौटते हुवे दुसरे तट पर नेमावर के दर्शन होंगे | नेमावर को  जमदग्नि ऋषि की तपोभूमि मानते हैं | नर्मदा जी में सूर्य कुंड है जो गर्मी में दिखता है | कुंड में शेषशायी भगवान की मूर्ति है |

इस स्थान को नर्मदाजी का नाभिस्थान मानते हैं |  नाभि स्थल तो शांत होना ही चाहिए. इतनी शांति कि जल में पूरी परछाई स्पष्ट दिख रही थी | अँधेरा होते तक शांति का आनंद लेते रहे | यहाँ महिला पदपरिक्रमा वासियों के दर्शन भी हुवे | हरदा में पोस्ट ऑफिस के पास माध्यम दरजे का सभी सुविधाओं के साथ होटल मयूर इन में रात्रि विश्राम किया.

दुसरे तट पर नेमावर
परिक्रमावासी
प्यारे बच्चों की प्यारी मुस्कान

आज पिपरिया (8.30 सुबह ) हरदा ( 5 बजे ) लगभग 234 किमी  वाया सेमरी, सांगा खेड़ा ,बबई, होशंगाबाद , सिवनी मालवा , टिमरनी, हरदा.  हरदा से हंडिया , वापिस हरदा (7.30 बजे) रास्ता: अच्छा दोपहर भोजन : होटल सेलिब्रेशन  शुद्ध शाकाहारी सिवनी मालवा रात्रि विश्राम : पोस्ट ऑफिस के पास होटल मयूर इन,   निकट  शाकाहारी भोजन डीज़ल : हरदा

विशेष : चौथे दिन की जानकारी 5 जुलाई 19 को इसी स्थान पर देखिये

Chronicle -4 Narmada Parikrama

account – day 2

दूसरा दिन 18.2.18 रविवार     महाराजपुर से  पिपरिया

संगम घाट पर माँ नर्मदा दर्शन, पूजन

महाराजपुर के विश्राम भवन में सभी प्रकार की सुविधाएं थीं . प्रातः स्नान , जलपान इत्यादि करने के बाद नर्मदाजी दर्शन पूजन के लिए संगम घाट पर गए. कल जब बिछिया से आ रहे थे तो एक नदी को लांघने के पहले जानकारी की | यह नर्मदाजी नहीं बल्कि बंजर नदी थी |महाराजपुर में बंजर का नर्मदा जी में संगम हो जाता है |

संगम घाट साफ सुथरा और अच्छा बना हुवा है. अम्बुदेश्वर  महादेव का मंदिर भी हैं ; नर्मदा जी  का पाट चौड़ा था ,जल की कमी होने के कारण घाट से नीचे सीढ़ियों से उतरने के बाद भी नर्मदाजी काफी दूर थीं |

 हमने  श्रीफल भेंट किया, पूजा अर्चना नर्मदा अष्टकम का पाठ किया.वहां उपस्थित लोगो को प्रसाद वितरण भी किया.

महाराजपुर का पुराना नाम सरस्वती प्रणव तीर्थ है | कहते है, यहाँ सरस्वती देवी ने तपस्या की थी |

संगम से लौटते समय गुरुद्वारा भी देखा. विश्राम के लिए हॉल है और कामन लेट्रिन बाथरूम है , साफ और सुविधाजनक है. यहाँ भी रुका जा सकता है |

महाराजपुर से नर्मदाजी की शहस्त्रधारा जो मंडला में है , कहा जाता है यहाँ सहत्रार्जुन ने अपनी भुजाओं से नर्मदाजी के प्रवाह को रोका था, के दर्शन के लिए नर्मदाजी को लांघना पड़ता , इसलिए शहस्त्रधरा का दर्शन से वंचित रह गए. माँ की जब इच्छा होगी, ये दर्शन भी करा देगी . अब घन्सोर से होते हुवे पिपरिया जाना है |

महाराजपुर से सुबह 10.30 को प्रस्थान किया . घन्सोर ,लखानादोंन, नरसिंगपुर और करेली , लगभग 174 किलोमीटर का सफर तय कर 1.30 बजे  करेली पहुँचे | शुद्ध शाकाहारी भोजनालय पूछने पर, हम परिक्रमावासी हैं , यह जानकर एक सज्जन  ने, गाडरवाडा रोड पर प्रिंस होटल तक स्वयम आगे चलकर  रास्ता बताया | ढाबा शुद्ध शाकाहारी और अच्छा भोजन और साफ सुथरा था. गुजरात से आये हुवे परिक्रमावासी जो अपने वाहनों से यात्रा कर रहे थे , वहां भोजन कर रहे थे |

प्रिंस होटल , करेली

भोजन के बाद वहां से गाडरवाडा , रास्ते में एक स्कूल में थोडा  विश्राम किया और फिर शाम  5 बजे पिपरिया  पहुँचे | महाराष्ट्र व राजस्थान से आये हुवे ठेकेदार गन्ने के खेतों से  बैल गाड़ियों से  गन्ने शक्कर मिलों में पहुंचा रहे थे | गाडरवाडा से रास्ता सिंगल है, इसके कारण भी समय अधिक लगा.

पिपरिया में , माहेश्वरी भवन, अलका होटल, अशोक होटल, गीतांजलि सभी स्थानों में शादी ब्याह के कारण कमरे उपलब्ध नहीं थे. रेलवे स्टेशन के पास लकी पैलेस होटल में रात्रि विश्राम किया, जबलपुर से बेटी रानी , दामाद आनंद बाबू भोजन ले कर आ गए थे.  2 घंटे बाद वे वापस लौट गए |

आज महाराजपुर (10.30 बजे) से पिपरिया ( 5 बजे संध्या ) ,लगभग 260 किमी  वाया घन्सोर, लखानादोंन, नरसिंगपुर, करेली , गाडरवारा, दोपहर भोजन : प्रिंस ढाबा शुद्ध  शाकाहारी करेली रात्रि विश्राम : होटल लकी पेलेस, रेलवे स्टेशन के पास रास्ता: गाडरवारा से पिपरिया सिंगल रोड , बैल गाडियों की भरमार डीज़ल – महाराजपुर

विशेष : तीसरे दिन का विवरण 27 जून 19 को कृपया इसी स्थान पर देखिये |

Chronicle-3 Narmada Parikrama

सर्वप्रथम माता व पिता को प्रणाम जिन्होंने यह जगत दिखाया,

उसके बाद सद्गुरु महान तपस्वी वीतराग परम पूज्य बाबाजी को प्रणाम,

जिन्होंने इस  जगत को समझाया और जीवन में से अज्ञान का अंधकार हटाने की अहैतुकी कृपा की |

ACCOUNT- DAY 1 17.2.2018

शनिवार अमरकंटक से महाराजपुर

13 फरवरी को महाशिवरात्रि का पर्व था..मै, पत्नी पुष्पा , हमारा विश्वषनीय ड्राईवर लोकनाथ , इन्नोवा कार  में  12 फरवरी को अमरकंटक आश्रम पहुँच गए थे. श्री कल्याण सेवा आश्रम अमरकंटक में  अनेकों संत व् गृहस्थ भी थे .प्रति वर्षानुसार इस वर्ष भी शिवरात्रि के मेले में आये हुए दर्शनार्थियौं के लिए पूज्य बाबाजी की कृपा से शिवरात्रि के दिन भंडारा किया गया था.

माँ नर्मदा परिक्रमा करने की अनुमति तो सदगुरुदेव परम पूज्य तपस्वी बाबा जी से उनके रायपुर प्रवास के समय मिल ही गई थी . परिक्रमा प्रारंभ करने के पहले श्री कल्याण सेवा आश्रम अमरकंटक में बाबा जी की पूजा की | पूज्य बाबाजी ने  आशीर्वाद व प्रसाद दिया | 

पूज्य बाबाजी की पूजा

पूज्य बाबाजी के निर्देशानुसार आश्रम से पूज्य राजा बाबा, अमृतानन्द जी, शांतानंदजी एवं अन्य संतों  के साथ हम माई की बगिया पहुंचे | ऐसी मान्यता है की नर्मदाजी वहां बाल रूप में खेला करती थी | वहां पंडितों ने संकल्प कराया | जेरीकेन और चूड़ीवाले छोटे लोटे (लोटी) में माँ  नर्मदाजी का जल  लिया | परिक्रमा के दौरान जिस स्थान पर  नर्मदाजी के दर्शन नहीं होते हैं ,वहां इसी रूप में माँ  की पूजा की जाती है | माई की बगिया में नर्मदा जी   की पूजा की, कढ़ाई प्रसाद (हलुवा) भोग लगाया | कन्याओं का पूजन किया , कन्याओं ने कढ़ाई प्रसाद ग्रहण किया, आशीर्वाद दिया |

माई की बगिया

माई की बगिया से संतों के साथ नर्मदा उद्गम स्थल मंदिर आ कर पूजा अर्चना कर दक्षिण तट से परिक्रमा प्रारंभ की | नियम के अनुसार नर्मदाजी हमेशा  , परिक्रमा वासी के  दाहिने हाथ की ओर होना चाहिये और नर्मदाजी को कभी भी लांघना नहीं / पार नहीं करना  चाहिये | माई की बगिया से परिक्रमा प्रारंभ करने वालों को  मुख्य मार्ग तक पहुँचने के लिए  रास्ते को समझने में थोड़ी कठिनाई होती है |  नियम में कोई  भूल चूक न हो , इसलिए राजाबाबा ने हमें नर्सरी के पास तक मुख्य मार्ग पर ला कर आगे का दिशा निर्देश दिया |

अब हम  इन्नोवा कार में  मै , पुष्पा , लोकनाथ तो थे ही, सामने की सीट पर परम पूज्य  बाबाजी  विराजमान हैं, ऐसा हमें आद्योपांत अनुभव होता रहा | माँ  नर्मदाजी हमारे दाहिने ओर थीं , उन्हें प्रणाम किया | शांत और सौम्य माँ ने आशीर्वाद दिया  , इस प्रकार दक्षिण तट से परिक्रमा प्रारंभ हुई | लगभग 1 बजे अमरकंटक से प्रस्थान किया.

अमरकंटक से डिंडोरी लगभग 90 किलो मीटर डेढ़ घंटे बाद पहुंचे | अमरकंटक से प्रस्थान करने के बाद पहली बार नर्मदा जी का दर्शन नमन किया | एयर कंडीशंड रेस्तरां और डाइनिंग  टेबल को छोड़ खुले में माँ  की गोद में ,आश्रम से साथ लाये पराठे ,  सब्जी, प्रसाद की  मिठाई पाने का आनंद लिया , बचपन याद आ गया |

नर्मदा दर्शन – डिंडोरी , भोजन घाट पर

डिंडोरी से महाराजपुर की दूरी 125 किमी है ,लगभग सवा तीन बजे महाराजपुर के लिए,  प्रस्थान किया | रास्ते में लगभग 5 बजे बिछिया में मिलन स्वीट्स में चाय पी | कार में लगे विनियर से सभी को जानकारी मिल जाती थी कि हम  परिक्रमा वासी हैं | पहली बार अनुभव हुवा की जनसाधारण के मानस में परिक्रमा वासीयों के प्रति  आदर और श्रद्धा का भाव रहता है.

महाराजपुर में रात्रि विश्राम के लिए, रामा रमण लाज की जानकारी थी, किन्तु वहां अत्यधिक भीड़ थी , सफाई की और  पानी की भी कमी थी | महाराजपुर में ही किंग फिशर होटल और रिसोर्ट नया व भव्य बना है, 1000 से 5000 रु तक कमरे हैं , किन्तु वह  शादी के लिए बुक था | मन में यह दुविधा भी थी कि परिक्रमा के दौरान इतनी  महंगी जगह में नहीं रुकना चाहिये |

पूरी परिक्रमा में पूज्य  बाबाजी मुझसे व्यवस्था व अन्य  जानकारियां  लगातार ले रहे थे | महाराजपुर में ही बेसिक सुविधाओं के साथ साधारण स्तर की  किरात धर्मशाला में 250 रू के कमरे , बुक कर , रात्रि भोजन के लिए शाकाहारी भोजनालय ढूंड रहे थे | इतने में ही अमरकंटक आश्रम से फ़ोन आया की महाराजपुर सर्किट हॉउस में व्यवस्था हो गई है |

 पूरी परिक्रमा में लगातार यह अनुभव हुवा की बाबाजी की कृपा और नर्मदा माँ का  स्नेह इतना है कि कहीं भी कोई असुविधा या ज़रा भी परेशानी नहीं हुई | कई स्थानों , आश्रमों में व मंदिरों में सहजता से  सब व्यवस्थाएं उपलब्ध होती गईं |

आज अमरकंटक ( 1 बजे ) – महाराजपुर ( 6 बजे) लगभग 230 किमी वाया डिंडोरी, समनापुर बिछिया . दोपहर भोजन : माँ नर्मदा तट डिंडोरी रात्रि विश्राम : सर्किट हॉउस महाराजपुर रात्रि भोजन : शुद्ध  शाकाहारी होटल किंगफिशर रास्ता: अच्छा

विशेष : दुसरे दिन का विवरण 20 जून 19 को इसी स्थान पर देखिये